Monday, 6 April 2026

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का Rule 40 :: संक्षिप्त परिचय -

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों के अध्याय II, भाग VI के नियम 40 (Rule 40) के तहत वित्तीय सहायता और चिकित्सा लाभ प्राप्त करने का प्रावधान है। यह नियम मुख्य रूप से 'BCI Advocates Welfare Fund' से संबंधित है।
यह नियम कैसे काम करते हैं:
1. नियम 40 क्या है?
नियम 40 के अनुसार, प्रत्येक अधिवक्ता जो राज्य नामावली (State Roll) में दर्ज है, उसे 'BCI Advocates Welfare Fund' में अनिवार्य रूप से योगदान देना होता है। यह योगदान दो तरह से होता है:
 * प्रवेश शुल्क (Admission Fee): नामांकन के समय।
 * वार्षिक सदस्यता (Annual Subscription): वकालत के दौरान नियमित अंतराल पर।
महत्वपूर्ण: यदि कोई अधिवक्ता इस सदस्यता शुल्क का भुगतान समय पर नहीं करता है, तो वह कल्याणकारी योजनाओं (चिकित्सा सहायता सहित) का लाभ लेने का अधिकार खो सकता है।
2. चिकित्सा सहायता के लिए पात्रता (Eligibility)
नियम 40 के तहत सहायता प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित शर्तें अनिवार्य हैं:
 * आपका नाम State Bar Council (जैसे UP Bar Council) की रोल पर होना चाहिए।
 * आपने Rule 40 के तहत अपनी सदस्यता राशि (Subscription) पूरी तरह जमा की हो और कोई बकाया न हो।
 * आप सक्रिय रूप से वकालत कर रहे हों।
3. सहायता मिलने वाली स्थितियाँ
इस फंड का उपयोग विशेष रूप से निम्नलिखित परिस्थितियों में 'Ex-gratia' (अनुग्रह राशि) देने के लिए किया जाता है:
 * गंभीर बीमारी: कैंसर, हृदय रोग, गुर्दा प्रत्यारोपण (Kidney Transplant), या पक्षाघात (Paralysis) जैसी गंभीर स्थितियां।
 * अस्पताल में भर्ती: यदि सदस्य कम से कम एक महीने के लिए अस्पताल में भर्ती रहा हो या उसकी बड़ी सर्जरी हुई हो।
 * अक्षमता: ऐसी शारीरिक स्थिति जो उसे पेशेवर काम करने से रोकती हो।
4. आवेदन कैसे करें?
नियम 40 के तहत चिकित्सा सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया इस प्रकार है:
 * निर्धारित फॉर्म (Form): आपको 'BCI Advocates Welfare Scheme' का आवेदन फॉर्म भरना होगा (यह अक्सर राज्य बार काउंसिल की वेबसाइट पर Rule 40 के तहत उपलब्ध होता है)।
 * स्थानीय बार का प्रमाणन: वाराणसी में, आपको अपनी Banaras Bar Association के अध्यक्ष या सचिव से फॉर्म पर हस्ताक्षर और मुहर लगवानी होगी, जो यह प्रमाणित करेगा कि आप वहां प्रैक्टिस कर रहे हैं।
 * मेडिकल सर्टिफिकेट: मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) या संबंधित अस्पताल के प्रमुख द्वारा जारी प्रमाण पत्र और डिस्चार्ज समरी संलग्न करनी होगी।
 * जमा करना: यह आवेदन आपकी State Bar Council (इलाहाबाद/लखनऊ कार्यालय) के माध्यम से BCI की कल्याण समिति को भेजा जाता है।
5. बीमा लाभ (Additional Benefit)
नियम 40 के तहत फंड का एक हिस्सा Group Insurance Policy (जैसे न्यू इंडिया एश्योरेंस आदि के साथ) के लिए भी उपयोग किया जाता है। यदि आप 20 वर्ष से अधिक समय से सदस्य हैं और आपकी आयु 65 वर्ष से कम है, तो आप और आपकी पत्नी 1 लाख रुपये तक के मेडिक्लेम के पात्र हो सकते हैं (BCI की वर्तमान पॉलिसी शर्तों के अधीन)।
सुझाव: ज़्यादातर कागजी कार्रवाई में देरी होती है। सभी अधिवक्ताओं को सुझाव है कि UP Bar Council के अपने रिकॉर्ड में यह सुनिश्चित कर लें कि Rule 40 का बकाया (Dues) शून्य है, क्योंकि इसके बिना आवेदन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
- अंशुमान दुबे एडवोकेट 

Tuesday, 24 March 2026

उत्तर प्रदेश अधिवक्ता कल्याण निधि न्यासी समिति लखनऊ :: संक्षिप्त परिचय:-

उत्तर प्रदेश अधिवक्ता कल्याण निधि न्यासी समिति, लखनऊ (U.P. Advocates Welfare Fund Trustee Committee) अधिवक्ताओं के हित में बनाई गई एक महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था है। इसका मुख्य उद्देश्य प्रदेश के वकीलों और उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा और सहायता देना है।

🔷 1. क्या है यह समिति?
यह समिति “उत्तर प्रदेश अधिवक्ता कल्याण निधि” का संचालन करती है।
इसका गठन अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए किया गया है।
यह आमतौर पर बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश और राज्य सरकार से जुड़ी व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करती है।
👉 यानी, यह एक तरह का वकीलों के लिए सामाजिक सुरक्षा फंड (Welfare Fund) है।

🔷 2. इसका मुख्य उद्देश्य अधिवक्ताओं को आर्थिक सहायता देना है:-
* मृत्यु होने पर उनके परिवार को सहायता।
* आपात स्थिति में सहयोग।
* अधिवक्ताओं के लिए बीमा/सुरक्षा जैसी योजनाएँ।

🔷 3. पैसा (Fund) कहाँ से आता है?
इस निधि में धन मुख्यतः इन स्रोतों से आता है:-
* वकीलों का सदस्यता शुल्क और वार्षिक अंशदान 
* वेलफेयर स्टाम्प/टिकट की बिक्री
* राज्य सरकार से अनुदान
👉 एक रिपोर्ट के अनुसार समिति के पास सैकड़ों करोड़ रुपये का फंड जमा रहा है और हर साल बड़ी राशि इसमें जुड़ती रहती है ।

🔷 4. अधिवक्ताओं को क्या लाभ मिलता है?
✔ मृत्यु पर सहायता
अधिवक्ता की मृत्यु होने पर उसके परिवार को आर्थिक सहायता। हाल के उदाहरण में कई मामलों में ₹5 लाख तक भुगतान किया गया है।
✔ अन्य लाभ
* बीमारी या आकस्मिक सहायता
* सेवानिवृत्ति/परिपक्वता राशि
* कुछ मामलों में समूह बीमा जैसी सुविधाएँ
👉 समय-समय पर यह राशि बढ़ाई भी गई है (जैसे 1.5 लाख से 5 लाख तक बढ़ाने के निर्णय)

🔷 5. सदस्य कैसे बनते हैं?
* अधिवक्ता को आवेदन करना होता है
* रजिस्ट्रेशन व सदस्यता शुल्क जमा करना होता है।
* बाद में वार्षिक अंशदान देना पड़ता है।

🔷 6. कार्यालय व प्रक्रिया
समिति का मुख्य कार्यालय लखनऊ (दारुलशफा क्षेत्र) में है 
यहाँ से:
* सदस्यता प्रमाण पत्र जारी होता है
* दावे (claims) निस्तारित किए जाते हैं
* डुप्लीकेट प्रमाण पत्र आदि की प्रक्रिया होती है

🔷 7. कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे/विवाद
* कई बार अधिवक्ताओं द्वारा फंड के पारदर्शिता (transparency) को लेकर सवाल उठाए गए। 
* कुछ मामलों में मृत्यु दावे लंबित रहने की शिकायतें भी सामने आईं 

🔷 8. हाल के बदलाव
उत्तर प्रदेश सरकार ने बजट में इस फंड को बढ़ाने (जैसे 200 करोड़ से 500 करोड़ तक) का प्रस्ताव भी दिया है।

✅ निष्कर्ष
👉 यह समिति वकीलों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण सुरक्षा तंत्र है।
👉 सही तरीके से चले तो अधिवक्ताओं और उनके परिवारों के लिए बड़ा सहारा।
👉 लेकिन इसकी पारदर्शिता और समय पर भुगतान हमेशा चर्चा का विषय रहा है।

***आलेख द्वारा अंशुमान दुबे एडवोकेट 

सदस्यता फार्म निम्न है:-

Thursday, 19 March 2026

ज्वाला प्रसाद सिर्फ एक वकील नहीं थे, वे कचहरी की राजनीति के 'स्वघोषित बेताज बादशाह' भी थे:-

यह कहानी है एडवोकेट 'ज्वाला' प्रसाद की। नाम तो ज्वाला था, लेकिन उनका व्यक्तित्व घी और मलाई से बना था। उनकी तोंद इतनी विशाल थी कि जब वे अपनी काली कोट पहनकर कचहरी के गलियारे में चलते, तो छोटे-मोटे वकील और मुवक्किल खुद-ब-खुद किनारे हट जाते थे।
ज्वाला प्रसाद सिर्फ एक वकील नहीं थे, वे कचहरी की राजनीति के 'स्वघोषित बेताज बादशाह' थे।
राजनीति की पाठशाला और जूनियरों की सेना
ज्वाला जी का सिद्धांत साफ था: "कानून किताबों से नहीं, रसूख से चलता है।" उन्होंने आधा दर्जन जूनियर वकील पाल रखे थे। ये जूनियर कानून की पढ़ाई करने नहीं, बल्कि ज्वाला जी की 'नेतागिरी' को चमकाने के लिए भर्ती किए गए थे।
जूनियरों का 'वर्क प्रोफाइल'
ज्वाला प्रसाद ने अपने जूनियरों को उनकी योग्यता के बजाय उनके 'दम-खम' के आधार पर काम बाँट रखे थे:
 * जूनियर नंबर 1 (जिंदाबाद-मुरदाबाद विशेषज्ञ): इसका काम था बार काउंसिल के चुनावों में पोस्टर चिपकाना और जब भी ज्वाला जी अदालत में घुसें, तो पीछे से 'शेर आया-शेर आया' का शोर मचाना।
 * जूनियर नंबर 2 (चाय-समोसा मैनेजर): इनका मुख्य काम ज्वाला जी के भारी-भरकम शरीर की ऊर्जा बनाए रखने के लिए समय-समय पर कचहरी की मशहूर कैंटीन से गरमा-गरम नाश्ता लाना था।
 * जूनियर नंबर 3 (फर्जी भीड़): जब भी ज्वाला जी को किसी कमजोर केस में जज पर दबाव बनाना होता, यह जूनियर तीस-चालीस 'भाड़े के मुवक्किल' लेकर कोर्ट रूम में खड़ा हो जाता ताकि माहौल गरमाया जा सके।
एक दिन की 'भारी' नेतागिरी
चुनाव करीब थे। ज्वाला प्रसाद को बार एसोसिएशन का अध्यक्ष बनना था। उन्होंने अपने जूनियरों को आदेश दिया, "कल अदालत परिसर में बड़ा विरोध प्रदर्शन होगा। पुलिस की बर्बरता के खिलाफ हम आवाज़ उठाएंगे। सबको काला फीता बांधकर आना है!"
असल में, पुलिस ने ज्वाला जी की एक अवैध पार्किंग वाली गाड़ी उठा ली थी, जिसे उन्होंने 'वकीलों का अपमान' घोषित कर दिया था।
कोर्ट रूम में ड्रामा
अगले दिन, ज्वाला जी अपने जूनियरों की फ़ौज के साथ जज साहब के सामने पेश हुए। उनका गला बैठा हुआ था (ज्यादा समोसे और चुनावी भाषणों के कारण)।
> ज्वाला प्रसाद: "हुज़ूर! यह वकीलों की अस्मिता का सवाल है। मेरे जूनियरों ने कल से अन्न नहीं ग्रहण किया है!"
> (तभी एक जूनियर के थैले से समोसे की खुशबू और चटनी की पुड़िया बाहर गिर गई)
जज साहब पुराने खिलाड़ी थे। उन्होंने चश्मा नीचे किया और बोले, "ज्वाला जी, आपका पेट तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। और आपके ये जूनियर वकालत की फाइलें पकड़ने के लिए हैं या आपके चुनाव का झंडा ढोने के लिए?"
अंत: जब 'कुर्सी' और 'कोट' दोनों खिसक गए
ज्वाला जी की नेतागिरी उस दिन धराशायी हो गई जब उनके सबसे पुराने जूनियर ने, जिसे वे सबसे ज्यादा प्रताड़ित करते थे, उनके खिलाफ ही विपक्षी खेमे से पर्चा भर दिया।
उस जूनियर ने कोर्ट में वह डायरी पेश कर दी जिसमें ज्वाला जी द्वारा जजों को 'मैनेज' करने के नाम पर मुवक्किलों से ली गई काली कमाई का हिसाब था।
परिणाम:
 * ज्वाला जी चुनाव हार गए।
 * उनकी तोंद चिंता के कारण थोड़ी कम होने लगी (क्योंकि अब मुफ्त के समोसे लाने वाले जूनियर भाग चुके थे)।
 * बार काउंसिल ने उनके खिलाफ जांच बैठा दी।
> सच्चाई: "जो दूसरों के कंधों पर पैर रखकर ऊँचा उठना चाहते हैं, वे अक्सर तब गिरते हैं जब नीचे वाले कंधे अपनी दिशा बदल लेते हैं।"
क्या आप चाहते हैं कि मैं उस जूनियर के विद्रोह और ज्वाला प्रसाद के बीच हुई कोर्ट रूम की तीखी बहस का एक सीन लिखूँ?

Tuesday, 17 March 2026

शिर्डी साईं बाबा का विरोध करने वालों का जो आधार है, उसका समाधान सांई बाबा के शब्दों में:-

शिर्डी के साईं बाबा के स्वरूप और उनकी शिक्षाओं को लेकर समय-समय पर जो तर्क दिए जाते हैं, उनका समाधान स्वयं बाबा के जीवन, उनके व्यवहार और उनके द्वारा कहे गए वचनों में निहित है। बाबा ने कभी भी विवादों में पड़ने के बजाय 'सबका मालिक एक' के सिद्धांत पर जोर दिया।
विरोध के मुख्य आधारों और बाबा के परिप्रेक्ष्य से उनके समाधान को इस प्रकार समझा जा सकता है:
1. स्वरूप और पहचान का प्रश्न (हिंदू या मुस्लिम?)
अक्सर विरोध इस बात पर होता है कि बाबा की पूजा सनातनी पद्धति से की जाए या उन्हें एक फकीर माना जाए।
 * बाबा का समाधान: बाबा ने स्वयं को कभी किसी एक धर्म की सीमाओं में नहीं बांधा। वे मस्जिद में रहते थे जिसका नाम उन्होंने 'द्वारकामाई' रखा था। वे माथे पर चंदन भी लगाते थे और नमाज भी पढ़ते थे।
 * वचन: बाबा अक्सर कहते थे, "जाति-पाति के चक्कर में मत पड़ो, मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है।" उन्होंने सिखाया कि ईश्वर को किसी भी रूप में भजो, वह एक ही है।
2. सगुण उपासना बनाम निर्गुण निराकार
कुछ लोग मूर्ति पूजा या किसी मनुष्य को भगवान मानने का विरोध करते हैं।
 * बाबा का समाधान: बाबा ने कभी यह दावा नहीं किया कि वे स्वयं भगवान हैं। उन्होंने हमेशा खुद को 'अल्लाह का बंदा' या ईश्वर का दास बताया। वे भक्तों को उनकी श्रद्धा के अनुसार दर्शन देते थे।
 * वचन: बाबा कहते थे, "जो मुझे जिस भाव से भजता है, मैं उसे उसी रूप में मिलता हूँ।" उनके लिए भक्ति का मार्ग 'श्रद्धा' (विश्वास) और 'सबूरी' (धैर्य) था, न कि केवल बाहरी कर्मकांड।
3. चमत्कार और भौतिक सुख
आलोचक तर्क देते हैं कि धर्म अध्यात्म के लिए है, न कि चमत्कार दिखाकर भीड़ जुटाने के लिए।
 * बाबा का समाधान: बाबा के चमत्कार केवल लोगों के कष्ट दूर करने के माध्यम थे, ताकि उनका विश्वास ईश्वर की ओर मुड़ सके। वे चिलम पीते थे और सादा जीवन जीते थे, जिससे यह संदेश मिलता था कि अध्यात्म दिखावे की वस्तु नहीं है।
 * वचन: "मैं अपने भक्तों को वह देता हूँ जो वे चाहते हैं, ताकि वे वह चाहने लगें जो मैं उन्हें देना चाहता हूँ (अर्थात आत्मकल्याण)।"
निष्कर्ष और समाधान का सार
साईं बाबा के उपदेशों का मूल किसी नए धर्म की स्थापना करना नहीं, बल्कि एकेश्वरवाद और सेवा था। विरोध करने वालों के तर्कों का समाधान बाबा के इन चार स्तंभों में मिलता है:
 * सबका मालिक एक: ईश्वर की एकता पर बल।
 * श्रद्धा और सबूरी: बिना धैर्य और विश्वास के अध्यात्म संभव नहीं।
 * सर्वधर्म समभाव: सभी मार्गों का सम्मान।
 * दान और सेवा: भूखे को अन्न और प्यासे को पानी देना ही सच्ची पूजा है।
बाबा का जीवन एक जीता-जागता उदाहरण था कि कैसे विरोधाभासों के बीच भी शांति और प्रेम से रहा जा सकता है।
क्या आप साईं सत्चरित्र के किसी विशिष्ट अध्याय या घटना के बारे में विस्तार से जानना चाहेंगे?

Sunday, 2 November 2025

एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 40: आदेश पर रोक (Stay of Order)

एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 40: आदेश पर रोक (Stay of Order)
यह प्रावधान एक अधिवक्ता के विरुद्ध अनुशासनात्मक समिति (Disciplinary Committee) द्वारा पारित आदेश को रोकने (या उस पर स्टे लगाने) से संबंधित है।
मूल सिद्धांत: धारा 37 या धारा 38 के तहत दायर की गई अपील (क्रमशः बार काउंसिल ऑफ इंडिया या सुप्रीम कोर्ट में) अपने आप में उस आदेश के निष्पादन पर रोक नहीं लगाती है जिसके खिलाफ अपील की गई है।
रोक लगाने की शक्ति: बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासनात्मक समिति या सुप्रीम कोर्ट, जैसा भी मामला हो, उचित कारण होने पर, ऐसे आदेश पर रोक लगाने का निर्देश दे सकता है और इसके लिए शर्तें भी लगा सकता है।
अपील से पहले रोक: यदि अपील दायर करने की समय सीमा समाप्त होने से पहले रोक के लिए आवेदन किया जाता है, तो स्टेट बार काउंसिल या बार काउंसिल ऑफ इंडिया की अनुशासनात्मक समिति उचित कारण पाए जाने पर अंतरिम रोक लगा सकती है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियमों का नियम 40 (कल्याण कोष)

बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियमों का नियम 40 (कल्याण कोष) यह नियम आमतौर पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों के भाग VI, अध्याय II, धारा IV-A के तहत आता है, और यह अधिवक्ताओं के कल्याण कोष से संबंधित है।
अनिवार्य अंशदान: यह नियम प्रत्येक अधिवक्ता को, जिस स्टेट बार काउंसिल की रोल में उनका नाम दर्ज है, उसे एक निश्चित राशि का अंशदान (आवधिक रूप से या एकमुश्त जीवन भर के लिए) देने के लिए बाध्य करता है।
उद्देश्य: इस एकत्रित राशि का उपयोग एडवोकेट्स वेलफेयर फंड (Advocates Welfare Fund) के लिए किया जाता है, जिसका उद्देश्य गंभीर बीमारी, मृत्यु, या अन्य कठिनाइयों के मामलों में अधिवक्ताओं या उनके परिवारों को वित्तीय सहायता और कल्याणकारी लाभ प्रदान करना है।
परिणाम: इस अनिवार्य अंशदान का भुगतान न करने वाले अधिवक्ता आमतौर पर कल्याणकारी योजनाओं के लाभों और विशेषाधिकारों के हकदार नहीं होते हैं।

Saturday, 5 July 2025

विवेकानंद प्रवास स्थल - गोपाल विला, अर्दली बाजार, वाराणसी :: बने राष्ट्रीय स्मारक।

स्वामी विवेकानंद का वाराणसी से गहरा संबंध था। उन्होंने वाराणसी में कई बार प्रवास किया, जिनमें 1888 में पहली बार आगमन और 1902 में अंतिम प्रवास शामिल है। 1888 में, उन्होंने वाराणसी में उन स्थानों का दौरा किया जहाँ गौतम बुद्ध और आदि शंकराचार्य ने उपदेश दिए थे, साथ ही भूदेव मुखोपाध्याय और त्रैलंग स्वामी जैसे विद्वानों से भी मिले थे। 1902 में, अपने अंतिम प्रवास के दौरान, उन्होंने "गोपाल विला" में 35 दिन बिताए और स्थानीय युवाओं को प्रेरित किया। 
वाराणसी में स्वामी विवेकानंद के प्रवास:
पहला प्रवास (1888):
स्वामी विवेकानंद ने 1888 में वाराणसी की अपनी पहली यात्रा में, गौतम बुद्ध और आदि शंकराचार्य के उपदेश स्थलों का दौरा किया, और भूदेव मुखोपाध्याय तथा त्रैलंग स्वामी जैसे विद्वानों से मुलाकात की। 
1890 में वाराणसी:
1890 में, उन्होंने वाराणसी की एक और यात्रा की, जो 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में उनकी ऐतिहासिक उपस्थिति से पहले की थी। 
1902 में अंतिम प्रवास:
1902 में, अपने अंतिम प्रवास के दौरान, स्वामी विवेकानंद "गोपाल विला" में लगभग 35 दिनों तक रहे, जहाँ उन्होंने स्थानीय युवाओं को प्रेरित किया और "सेवा का घर" (सेवाश्रम) की स्थापना में मदद की। 
गोपाल विला:
"गोपाल विला" में उनके प्रवास के दौरान, उन्होंने युवाओं को प्रेरित किया जो एक संघ शुरू कर रहे थे और शहर के गरीब और बेसहारा रोगियों की सेवा कर रहे थे। 
केदारेश्वर मंदिर:
स्वामी विवेकानंद को केदारेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी ने व्यक्तिगत रूप से मंदिर में आमंत्रित किया था, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। 
अंतिम यात्रा:
यह उनकी अंतिम यात्रा थी, जिसके बाद 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में उनका निधन हो गया। 
वाराणसी से संबंध:
माता का काशी आगमन:
स्वामी विवेकानंद की मां भुवनेश्वरी देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिए वाराणसी के वीरेश्वर मंदिर में प्रार्थना की थी। 
बाल्यावस्था:
स्वामी विवेकानंद का जन्म काशी में ही हुआ था और उनका बचपन का नाम वीरेश्वर था। 
ज्ञान प्राप्ति:
वाराणसी प्रवास के दौरान, स्वामी विवेकानंद ने बौद्ध धर्म के बारे में बहुत ज्ञान प्राप्त किया। 
शिकागो जाने की प्रेरणा:
वाराणसी में प्रवास के दौरान, उन्हें शिकागो में विश्व धर्म संसद में भाग लेने की प्रेरणा मिली। 
स्मारक की मांग:
वाराणसी के अर्दली बाजार में स्वामी विवेकानंद के प्रवास स्थल पर एक स्मारक बनाने की मांग की जा रही है। 




बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का Rule 40 :: संक्षिप्त परिचय -

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों के अध्याय II, भाग VI के नियम 40 (Rule 40) के तहत वित्तीय सहायता और चिकित्सा लाभ प्राप्त करने का प्रावध...