1. सर्वोच्च न्यायालय का मूल और निर्णायक फैसला:-
Harish Uppal Case:-
Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India, निर्णय दिनांक 17.12.2002, रिपोर्टेड (2003) 2 SCC 45, में सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ताओं की हड़ताल और कोर्ट-बॉयकॉट के पूरे प्रश्न पर विस्तृत निर्णय दिया।
•सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्देश इस प्रकार हैं: "अधिवक्ताओं को हड़ताल का अधिकार नहीं है!"
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि:-
*अधिवक्ताओं को Strike करने का कोई अधिकार नहीं है।
*Bar Association द्वारा दिया गया Court Boycott Call भी वैध अधिकार नहीं है।
*यहां तक कि सामान्यतः एक दिन की Token Strike भी अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती।
*अर्थात केवल इसलिए कि Bar Association ने प्रस्ताव पारित कर दिया है, प्रत्येक अधिवक्ता के लिए न्यायालय से अनुपस्थित रहना वैध नहीं हो जाता।
2. Bar Association का प्रस्ताव अधिवक्ता को Court जाने से नहीं रोक सकता:-
सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश दिया कि यदि कोई अधिवक्ता Bar Association के हड़ताल/बहिष्कार के आह्वान के बावजूद न्यायालय में उपस्थित होना चाहता है तो उसे:
*रोका नहीं जा सकता,
*धमकाया नहीं जा सकता,
*उसके विरुद्ध Association की कार्रवाई नहीं हो सकती,
*उसकी membership समाप्त करने या expel करने की धमकी नहीं दी जा सकती।
*इसलिए "Association ने Strike का निर्णय लिया है, इसलिए कोई Advocate Court नहीं जाएगा" - यह कानूनी रूप से सही स्थिति नहीं है।
3. Vakalatnama वाला अधिवक्ता विशेष रूप से Court से अनुपस्थित नहीं हो सकता:-
यदि किसी अधिवक्ता के पास किसी मुकदमे का Vakalatnama है और उसने विधिवत discharge नहीं लिया है, तो वह Bar Association की हड़ताल के कारण उस मामले में उपस्थित होने से मना नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ऐसा करना:
*professional misconduct,
*professional duty का breach,
*contract का breach और
*client के प्रति trust का breach
हो सकता है।
महत्वपूर्ण बात
अधिवक्ता व्यक्तिगत रूप से नया brief लेने से मना कर सकता है, लेकिन पहले से लंबित मामले में, जिसमें वह Vakalatnama पर है, केवल Strike Call के कारण अनुपस्थित नहीं रह सकता।
4. Court को Strike के कारण मुकदमा स्थगित करना आवश्यक नहीं:-
यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
Court advocates की strike के कारण proceedings adjourn करने के लिए बाध्य नहीं है।
बल्कि Court का कर्तव्य है कि वह judicial business जारी रखे। यदि advocate strike पर हैं, तब भी Court मामले को आगे बढ़ा सकती है।
इसका सीधा अर्थ है:
"आज Bar Association की हड़ताल है, इसलिए आज सभी cases adjourn होंगे" — यह स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं है।
5. Strike में अनुपस्थित Advocate पर व्यक्तिगत लागत भी लग सकती है:-
यदि कोई Advocate Strike Call के कारण अपने client के मामले में Court में उपस्थित नहीं होता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह:
personally costs के लिए liable हो सकता है;
और यदि client को नुकसान हुआ है तो उसके लिए damages की liability भी हो सकती है।
यह व्यक्तिगत liability है; केवल यह कहना कि "Bar Association ने strike का निर्णय लिया था" अपने-आप में पूर्ण बचाव नहीं है।
6. अत्यंत सीमित अपवाद — "Rarest of Rare":-
यहाँ एक महत्वपूर्ण nuance है।
Harish Uppal में Court ने कहा कि सामान्यतः strike/abstention की अनुमति नहीं है। लेकिन यदि मामला Bar अथवा Bench की dignity, integrity और independence से संबंधित अत्यंत गंभीर परिस्थिति का हो, तो Court एक बहुत सीमित अपवाद के रूप में अधिकतम एक दिन के protest abstention को नजरअंदाज कर सकती है।
लेकिन यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि:
यह अधिवक्ताओं का "अधिकार" नहीं है।
यह कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि Bar Association हर महत्वपूर्ण मुद्दे को "dignity of Bar" बताकर एक दिन की strike करा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह निर्धारित करना Court का कार्य है कि मामला वास्तव में Bar/Bench की dignity, integrity या independence से संबंधित है या नहीं।
7. Strike से पहले Chief Justice/District Judge से consultation:-
यदि ऐसी असाधारण परिस्थिति उत्पन्न होती है जिसमें Bar को लगता है कि मामला वास्तव में Bench/Bar की dignity, integrity अथवा independence से जुड़ा है, तो Harish Uppal के अनुसार Bar के President को पहले संबंधित:
Chief Justice, अथवा
District Judge
से consultation करना चाहिए।
और उस प्रश्न पर Court का निर्णय महत्वपूर्ण माना गया है।
8. Bar Association को Strike के बजाय वैकल्पिक विरोध करना चाहिए:-
Supreme Court ने कई वैकल्पिक तरीके बताए हैं, जैसे:
*Resolution पारित करना
*Representation देना
*Press Statement
*TV/Media interview
*Silent March
*Dharna
*Relay Fast
*Black/White Armband लगाना
*Court premises के बाहर peaceful protest
*Banner/placard आदि
*लेकिन ऐसा protest Court proceedings को बाधित किए बिना होना चाहिए।
9. Bar Council of India की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने Bar Council of India की 29.09.2002 की Resolution को महत्वपूर्ण माना और सभी Bar Associations को उसके implementation का निर्देश दिया।
साथ ही Court ने कहा कि Advocates की grievances के लिए:-
Taluka level,
District level,
High Court level और
Supreme Court level
पर Grievance Redressal Committees बनाए जाने चाहिए ताकि हर समस्या का समाधान Strike के माध्यम से करने की आवश्यकता न पड़े।
10. High Courts को Rule बनाने का निर्देश:-
Harish Uppal में Supreme Court ने High Courts को Section 34, Advocates Act, 1961 के तहत आवश्यक rules बनाने की बात कही, जिससे Strike के कारण न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप करने वाले advocates के विरुद्ध appropriate action लिया जा सके।
इसका महत्व इसलिए है क्योंकि High Court अपने अधीनस्थ न्यायालयों में Advocates के practice के संबंध में rules बना सकता है।
11. उत्तर प्रदेश में विशेष स्थिति:- उत्तर प्रदेश में भी इस विषय पर न्यायिक प्रशासन ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं:-
Allahabad High Court/High Court administration के circulars में Supreme Court के Harish Uppal सहित विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि District Courts में advocates की strikes के कारण बहुत से working days नष्ट हो रहे हैं और इसे रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
12. एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर — "Strike" और "Protest" यह distinction बहुत महत्वपूर्ण है:-
वैध/स्वीकार्य protest:-
Representation + Resolution + Press Conference + Peaceful Dharna + Silent March + Armband आदि
न्यायिक कार्य से विरत/Strike:-
Court में उपस्थित न होना + मामलों की hearing रोकना + Court Boycott + दूसरे advocates को Court जाने से रोकना
दूसरी श्रेणी को Supreme Court ने अत्यंत गंभीरता से लिया है।
13. वर्तमान स्थिति:- 2024 में Supreme Court ने आगे की व्यवस्था पर भी विचार किया
इस विषय को केवल 2002 का पुराना कानून मानना उचित नहीं होगा। दिसंबर 2024 में Supreme Court के समक्ष advocates' strikes को रोकने के लिए Bar Council of India द्वारा तैयार Draft Rules पर भी विचार हुआ। Court ने संबंधित सुझावों पर विचार कर report प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी।
इससे यह स्पष्ट है कि Supreme Court आज भी strike/abstention को न्यायिक प्रशासन के लिए गंभीर समस्या मानता है।
निष्कर्ष:-
कानूनी स्थिति को एक वाक्य में इस प्रकार कहा जा सकता है:
"Bar Association को हड़ताल का प्रस्ताव पारित करने की संगठनात्मक शक्ति हो सकती है, लेकिन उस प्रस्ताव के आधार पर किसी अधिवक्ता को Court में उपस्थित होने से रोकने का अधिकार नहीं है; और Vakalatnama धारण करने वाला Advocate केवल Strike Call के कारण अपने client के मामले से अनुपस्थित नहीं हो सकता।"