Sunday, 25 October 2026

23 साल की वकालत का अनुभव: चेहरे बदलते रहे, व्यवस्था नहीं!

बार एसोसिएशन से बार काउंसिल तक—वादों, स्वार्थ और व्यवस्था के पतन का एक कटु अनुभव।

वकालत करते हुए 23 वर्ष बीत गए। इस दौरान बार एसोसिएशन के अनेक अध्यक्ष और महामंत्री देखे, बार काउंसिल के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सदस्य भी देखे। हर चुनाव में नए चेहरे, नए नारे, नई घोषणाएँ और अधिवक्ताओं के हितों के लिए बड़े-बड़े संकल्प देखने को मिले। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो एक सवाल मन में उठता है—आखिर इतने वर्षों में अधिवक्ताओं की दशा बदलने के लिए वास्तव में बदला क्या?

सच कहूँ तो चुनाव पूर्व किए गए वादों और चुनाव के बाद उनकी वास्तविक स्थिति में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है। चुनाव से पहले अधिवक्ताओं का कल्याण सर्वोपरि होता है, उनकी समस्याएँ सबसे बड़ा मुद्दा होती हैं और उनके अधिकारों की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण संकल्प। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही समस्याएँ फिर से फाइलों, प्रस्तावों, आश्वासनों और अगले चुनाव के एजेंडे में सिमट जाती हैं।

समाज में आई गिरावट का असर कचहरी पर भी पड़ा

पिछले 23 वर्षों में समाज में जिस प्रकार नैतिक मूल्यों, सामाजिक सरोकारों और निःस्वार्थ सेवा की भावना में गिरावट दिखाई दी है, उसका प्रभाव कचहरी की व्यवस्था पर भी पड़ा है। कचहरी केवल मुकदमों की पैरवी करने का स्थान नहीं, बल्कि न्याय, अधिकार, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहाँ से समाज को दिशा मिलने की अपेक्षा की जाती है।

लेकिन जब नेतृत्व में सिद्धांतों के स्थान पर स्वार्थ, विचारधारा के स्थान पर अवसरवाद और सेवा के स्थान पर पद प्राप्त करने की लालसा हावी होने लगे, तो उसका प्रभाव पूरी व्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है।

आज चिंता केवल इस बात की नहीं है कि अधिवक्ताओं की समस्याएँ हल नहीं हुईं। चिंता इस बात की भी है कि उन समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक संघर्ष करने की इच्छाशक्ति और एकजुटता भी कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

हड़ताल की शक्ति कमजोर, संघर्ष की धार कुंद

एक समय था, जब अधिवक्ताओं की एकजुटता प्रशासन और शासन को अपनी मांगों पर गंभीरता से विचार करने के लिए विवश कर सकती थी। अधिवक्ताओं का सामूहिक निर्णय एक मजबूत संदेश माना जाता था।

आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। हड़ताल करने की शक्ति केवल संख्या से नहीं, बल्कि एकता, अनुशासन, नेतृत्व की विश्वसनीयता और सामूहिक हितों के प्रति प्रतिबद्धता से आती है। जब इन आधारों में कमजोरी आती है, तो आंदोलन का प्रभाव भी कम होने लगता है।

यह विचारणीय है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ पैदा हुईं, जिनमें अधिवक्ताओं का सामूहिक दबाव पहले जैसा प्रभावी नहीं रह गया? क्या इसका कारण नेतृत्व के प्रति विश्वास में कमी है? क्या अधिवक्ता व्यक्तिगत व्यस्तताओं और आर्थिक विवशताओं के कारण सामूहिक संघर्ष से दूर हो रहे हैं? या फिर आंदोलनों का उपयोग भी कहीं-कहीं नेतृत्व की राजनीतिक और चुनावी जरूरतों के अनुसार होने लगा है?

इन प्रश्नों का उत्तर तलाशना जरूरी है।

COP और AIBE: पेशेवर जवाबदेही के साथ कल्याण भी जरूरी

वकालत के क्षेत्र में COP यानी Certificate of Practice तथा AIBE यानी All India Bar Examination जैसी व्यवस्थाएँ सामने आईं। इनके पीछे पेशेवर योग्यता, नियमन और अधिवक्ता के अभ्यास से संबंधित आवश्यकताओं का तर्क है। इन व्यवस्थाओं के औचित्य पर चर्चा हो सकती है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि अधिवक्ताओं के पेशेवर दायित्वों के साथ उनके अधिकारों और कल्याण के प्रति संस्थागत जिम्मेदारी कितनी प्रभावी रही है?

यदि अधिवक्ताओं से नियमों के पालन, परीक्षा और प्रमाणन की अपेक्षा की जाती है, तो क्या उनके लिए सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, पेंशन और आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी उसी गंभीरता से सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए?

जिम्मेदारियाँ बढ़ें, यह उचित हो सकता है; लेकिन जिम्मेदारियों के साथ अधिकारों और कल्याण की व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए।

मेडिक्लेम, पेंशन और युवा भत्ता: मांगें आज भी सवाल बनी हुई हैं

अधिवक्ताओं के कल्याण से जुड़ी अनेक मांगें वर्षों से चर्चा में रही हैं। इनमें प्रमुख रूप से—

- अधिवक्ताओं के लिए प्रभावी मेडिक्लेम और स्वास्थ्य सुरक्षा।
- अधिवक्ताओं के लिए सम्मानजनक पेंशन या सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था।
- आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद अधिवक्ताओं के लिए सहायता।
- युवा अधिवक्ताओं के लिए व्यावहारिक आर्थिक सहयोग या युवा भत्ता।
- दिवंगत अधिवक्ताओं के आश्रितों के लिए समयबद्ध और पर्याप्त सहायता।
- अधिवक्ताओं के पेशेवर सम्मान, सुरक्षा और कार्य परिस्थितियों में सुधार।

इन विषयों पर चुनाव के समय भाषण होते हैं, घोषणाएँ होती हैं, संकल्प लिए जाते हैं और अधिवक्ताओं के बीच उम्मीदें जगाई जाती हैं। लेकिन वर्षों बाद भी जब इन मांगों के समाधान की स्थिति पर सवाल उठता है, तो अधिवक्ताओं को ठोस परिणाम, समयसीमा और जवाबदेही के आधार पर नेतृत्व का मूल्यांकन करना पड़ता है।

विडंबना यह है कि जिन मांगों को पूरा करने का वादा करके समर्थन प्राप्त किया जाता है, वही मांगें अगले चुनाव में फिर से उठाई जाती हैं।

क्या अधिवक्ताओं के कल्याण की मांगें केवल चुनाव जीतने का साधन बनकर रह जाएँगी, या कभी उनके समाधान की निश्चित समयसीमा भी तय होगी?

चुनावी संस्कृति: विचारों से ज्यादा प्रबंधन का महत्व?

एक और प्रवृत्ति पर चर्चा जरूरी है। चुनाव के समय सशुल्क जूनियरों, चुनावी प्रबंधन करने वालों और विभिन्न प्रकार के प्रचार तंत्रों की भूमिका बढ़ती दिखाई देती है। इसमें किसी भी व्यक्ति को पारिश्रमिक देकर काम पर रखने को अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता; चुनावी काम में पेशेवर सहयोग स्वाभाविक भी हो सकता है।

समस्या तब पैदा होती है, जब चुनाव का केंद्र उम्मीदवार का काम, चरित्र, दृष्टिकोण और अधिवक्ताओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता न होकर केवल संसाधनों, प्रचार-प्रबंधन और मतों को प्रभावित करने की रणनीतियों तक सिमट जाए।

जब चुनाव सेवा की योग्यता का मूल्यांकन करने के बजाय प्रबंधन की क्षमता का प्रदर्शन बन जाए, तब ईमानदार और मुद्दों पर आधारित नेतृत्व के सामने कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं।

क्या उम्मीदवार का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने पिछले कार्यकाल में क्या किया, कौन-से वादे पूरे किए और अधिवक्ताओं के हित में कौन-से ठोस प्रयास किए?

जातिवादी मठाधीशी: संगठन के भीतर विभाजन की राजनीति

इसके साथ ही जातिगत समीकरणों और प्रभावशाली समूहों की भूमिका भी एक गंभीर प्रश्न है। जब किसी संगठन में योग्यता, ईमानदारी और कार्यक्षमता से अधिक महत्व जातिगत पहचान, गुटबंदी और व्यक्तिगत प्रभाव को मिलने लगे, तो संगठन की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है।

जाति के आधार पर किसी व्यक्ति का समर्थन करना या किसी सामाजिक समूह का प्रतिनिधित्व करना अपने आप में दोष नहीं है। समस्या तब है, जब जाति को योग्यता का विकल्प और व्यक्तिगत हितों को सामूहिक कल्याण से ऊपर रख दिया जाता है।

बार एसोसिएशन और बार काउंसिल जैसी संस्थाओं का उद्देश्य किसी जाति, गुट या व्यक्ति विशेष के हितों की रक्षा तक सीमित नहीं हो सकता। इनका दायित्व समस्त अधिवक्ता समुदाय के अधिकारों, सम्मान और कल्याण के लिए काम करना है।

अधिवक्ता की पहचान उसके ज्ञान, आचरण, ईमानदारी और संघर्ष से होनी चाहिए—न कि इस बात से कि वह किस जाति या गुट से संबंध रखता है।

निःस्वार्थ नेतृत्व का संकट और कार्यकर्ताओं की बदलती भूमिका

23 वर्षों के अनुभव के बाद मन में सबसे बड़ी निराशा यही है कि व्यवस्था को बदलने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन व्यवस्था बदलने के लिए आवश्यक निःस्वार्थ नेतृत्व और निःस्वार्थ प्रशासन दुर्लभ दिखाई देते हैं।

पद सेवा का माध्यम होना चाहिए, प्रतिष्ठा का स्थायी प्रमाणपत्र नहीं। नेतृत्व का अर्थ दूसरों से सम्मान प्राप्त करना भर नहीं, बल्कि कठिन समय में जिम्मेदारी उठाना भी है। प्रशासन का अर्थ केवल नियमों और प्रक्रियाओं का संचालन नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है।

लेकिन जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा सामूहिक हितों पर हावी हो जाए, तो संगठन धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से दूर होने लगता है।

इस स्थिति का एक दूसरा पहलू भी है—कार्यकर्ताओं की बदलती मानसिकता। कभी लोग विचार, सिद्धांत और संगठन के प्रति निष्ठा के कारण काम करते थे। आज अनेक जगहों पर कार्यकर्ताओं के सामने भी निजी लाभ, पद, पहचान और भविष्य में मिलने वाले प्रतिफल की अपेक्षाएँ महत्वपूर्ण हो गई हैं।

हालाँकि सभी कार्यकर्ताओं को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। आज भी ऐसे लोग हैं जो बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के काम करते हैं। लेकिन निःस्वार्थ कार्यकर्ताओं की भूमिका कमजोर पड़ने लगे, तो संगठन का चरित्र भी बदलने लगता है।

जब नेतृत्व सेवा के बजाय स्वार्थ से प्रेरित हो और कार्यकर्ता विचार के बजाय लाभ से, तब संगठन केवल नाम और ढाँचे में जीवित रहता है; उसकी आत्मा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।

क्या व्यवस्था कभी बदलेगी?

अनुभव बार-बार यही कहता है कि चेहरे बदलते रहेंगे, पदाधिकारी आते-जाते रहेंगे, चुनाव होते रहेंगे और नए वादे किए जाते रहेंगे। लेकिन यदि व्यवस्था की कार्यशैली, नेतृत्व की जवाबदेही और अधिवक्ताओं की सामूहिक चेतना में परिवर्तन नहीं आया, तो परिणाम भी बहुत अलग नहीं होंगे।

फिर भी, यह मान लेना कि कुछ नहीं बदल सकता, शायद सबसे बड़ी हार होगी। व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती; उसे बदलने के लिए जागरूक सदस्य, पारदर्शी नेतृत्व, सक्रिय निगरानी और वादों का हिसाब माँगने वाली मजबूत संस्थागत संस्कृति चाहिए।

बार एसोसिएशन और बार काउंसिल के चुनाव में केवल यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि उम्मीदवार कौन है, उसका समर्थक कौन है और उसके पास कितना चुनावी प्रबंधन है। यह भी पूछा जाना चाहिए—

1. पिछले कार्यकाल में उसने अधिवक्ताओं के लिए क्या ठोस काम किया?
2. उसने कौन-से वादे किए थे और उनमें से कितने पूरे हुए?
3. अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए उसकी कार्ययोजना क्या है?
4. प्रत्येक प्रस्ताव को लागू करने की समयसीमा क्या होगी?
5. यदि वादे पूरे नहीं होते, तो जवाबदेही कैसे तय होगी?
6. क्या वह चुनाव के बाद भी सामान्य अधिवक्ता की समस्याओं के लिए उपलब्ध रहेगा?

जब तक चुनाव में इन सवालों का महत्व नहीं बढ़ेगा, तब तक केवल नारों और घोषणाओं के आधार पर नेतृत्व चुनने की परंपरा बदलना कठिन होगा।

अंत में—23 साल का अनुभव, एक कड़वा सवाल

मुझे न किसी पद से व्यक्तिगत शिकायत है, न किसी व्यक्ति विशेष से। मेरा सवाल उस कार्यसंस्कृति से है, जिसमें अधिवक्ताओं की समस्याएँ चुनावी भाषणों में जीवित रहती हैं, लेकिन उनके समाधान की गति अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं दिखाई देती।

23 वर्षों में अनेक अध्यक्ष, महामंत्री, चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सदस्य आए और गए। हर बार उम्मीद जगी कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। लेकिन जब वही मुद्दे बार-बार सामने आते हैं, तो सवाल व्यक्तियों से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था पर खड़ा हो जाता है।

आखिर कब तक अधिवक्ताओं के कल्याण के नाम पर चुनाव जीते जाते रहेंगे? कब तक मेडिक्लेम, पेंशन और युवा भत्ते जैसी मांगें घोषणापत्रों की शोभा बनकर रह जाएँगी? और कब अधिवक्ता समुदाय अपने प्रतिनिधियों से केवल वादे नहीं, बल्कि उनके परिणामों का हिसाब माँगेगा?

व्यवस्था बदलने की शुरुआत किसी एक महान नेता से नहीं, बल्कि उस दिन से होगी, जब अधिवक्ता व्यक्तिगत संबंधों, जातिगत समीकरणों, गुटबंदी और चुनावी प्रलोभनों से ऊपर उठकर अपने विवेक से निर्णय लेंगे।

क्योंकि सच यही है—

चेहरे बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था तब बदलती है, जब नेतृत्व की नीयत, प्रशासन की कार्यशैली और समाज की सोच बदलती है।

और यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आशंका यही है कि अगले 23 वर्षों बाद भी कोई अधिवक्ता इसी कचहरी में खड़ा होकर यही सवाल पूछ रहा होगा—आखिर बदला क्या?

— अंशुमान दुबे
अधिवक्ता | रिपोर्टर | शान-ए-काशी

Monday, 24 August 2026

धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना - सही या ग़लत?

धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना लोकतांत्रिक राजनीति की स्वस्थ दिशा नहीं है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि इसके लिए केवल राजनेता ही जिम्मेदार नहीं हैं; राजनीतिक दल, मतदाता, मीडिया, सामाजिक संस्थाएँ और हमारी चुनावी संस्कृति, सभी की भूमिका है।

क्या जनता और नेताओं की सोच बदल सकती है?
"लोकतांत्रिक चेतना किसी एक कानून से नहीं आती; वह शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा, सूचना की गुणवत्ता, संस्थाओं की मजबूती और लगातार राजनीतिक अनुभव से विकसित होती है।"

वर्तमान परिस्थितियों को परिवर्तित करने के लिए, तीन स्तरों पर प्रयास की आवश्यकता है:-
1. जाति/धर्म से मुद्दों की राजनीति की ओर:-
जब मतदाता यह पूछना शुरू करता है कि मेरे क्षेत्र में रोजगार कितना बढ़ा, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति क्या है, सड़क-पानी-कानून व्यवस्था कैसी है और जनप्रतिनिधि ने क्या काम किया, तब पहचान आधारित राजनीति की शक्ति धीरे-धीरे घटती है।
2. नेता से जवाबदेही की ओर:-
भारतीय लोकतंत्र तब अधिक परिपक्व होगा जब चुनाव में यह पर्याप्त नहीं होगा कि नेता कहे—“मैं आपकी जाति/धर्म/क्षेत्र का प्रतिनिधि हूँ”; बल्कि उससे पूछा जाएगा—“पिछले पाँच वर्ष में आपने किया क्या?”
3. मतदाता से नागरिक बनने की ओर:-
सबसे बड़ा परिवर्तन तब होगा जब हम जाति, धर्म या क्षेत्र के मतदाता से आगे बढ़कर संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों वाले नागरिक के रूप में मतदान करेंगे।

महत्वपूर्ण बात:-
जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र अपने-आप में समस्या नहीं हैं। भारत की विविधता लोकतंत्र की शक्ति भी है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक नेतृत्व इन पहचानों को सामाजिक सम्मान और प्रतिनिधित्व देने के बजाय भय, घृणा और विभाजन पैदा करने के औजार के रूप में इस्तेमाल करता है।

असली सवाल यह नहीं है कि “जातिवाद कब खत्म होगा?” बल्कि यह है:-
“कब भारतीय मतदाता अपनी पहचान के साथ-साथ अपने संवैधानिक और आर्थिक हितों को भी चुनावी निर्णय का प्रमुख आधार बनाएगा?”
भारत में यह परिवर्तन एक पीढ़ी में काफी हद तक दिखाई दे सकता है, यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वतंत्र एवं तथ्यपरक मीडिया, राजनीतिक पारदर्शिता, चुनावी सुधार और नागरिक जागरूकता लगातार मजबूत होते रहें। लेकिन यदि राजनीतिक दलों को विभाजनकारी राजनीति से लगातार चुनावी लाभ मिलता रहा, तो यह प्रक्रिया बहुत लंबी भी हो सकती है।

भारतीय लोकतंत्र की असली परिपक्वता उस दिन मानी जाएगी जब नेता जनता से यह कहना बंद कर दे कि “तुम किस जाति/धर्म के हो?” और जनता नेता से पूछना शुरू कर दे—“तुमने संविधान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय के लिए क्या किया?”

Saturday, 22 August 2026

अधिवक्ता संगठनों के द्वारा 'हड़ताल' अथवा 'कार्य से विरत' पर भारत की अदालतों ने क्या-क्या निर्देश अथवा आदेश दिए हैं?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अधिवक्ताओं की हड़ताल/न्यायालय बहिष्कार/कार्य से विरत रहने के संबंध में बहुत स्पष्ट और कठोर सिद्धांत निर्धारित किए हैं। इसका सबसे महत्वपूर्ण फैसला Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India, (2003) 2 SCC 45 है। इसके अलावा विभिन्न उच्च न्यायालयों ने भी इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर निर्देश जारी किए हैं।
1. सर्वोच्च न्यायालय का मूल और निर्णायक फैसला:-
Harish Uppal Case:-
Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India, निर्णय दिनांक 17.12.2002, रिपोर्टेड (2003) 2 SCC 45, में सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ताओं की हड़ताल और कोर्ट-बॉयकॉट के पूरे प्रश्न पर विस्तृत निर्णय दिया। 
•सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्देश इस प्रकार हैं: "अधिवक्ताओं को हड़ताल का अधिकार नहीं है!"
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि:-
*अधिवक्ताओं को Strike करने का कोई अधिकार नहीं है।
*Bar Association द्वारा दिया गया Court Boycott Call भी वैध अधिकार नहीं है।
*यहां तक कि सामान्यतः एक दिन की Token Strike भी अधिकार के रूप में नहीं की जा सकती। 
*अर्थात केवल इसलिए कि Bar Association ने प्रस्ताव पारित कर दिया है, प्रत्येक अधिवक्ता के लिए न्यायालय से अनुपस्थित रहना वैध नहीं हो जाता।
2. Bar Association का प्रस्ताव अधिवक्ता को Court जाने से नहीं रोक सकता:-
सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश दिया कि यदि कोई अधिवक्ता Bar Association के हड़ताल/बहिष्कार के आह्वान के बावजूद न्यायालय में उपस्थित होना चाहता है तो उसे:
*रोका नहीं जा सकता,
*धमकाया नहीं जा सकता,
*उसके विरुद्ध Association की कार्रवाई नहीं हो सकती,
*उसकी membership समाप्त करने या expel करने की धमकी नहीं दी जा सकती। 
*इसलिए "Association ने Strike का निर्णय लिया है, इसलिए कोई Advocate Court नहीं जाएगा" - यह कानूनी रूप से सही स्थिति नहीं है।
3. Vakalatnama वाला अधिवक्ता विशेष रूप से Court से अनुपस्थित नहीं हो सकता:-
यदि किसी अधिवक्ता के पास किसी मुकदमे का Vakalatnama है और उसने विधिवत discharge नहीं लिया है, तो वह Bar Association की हड़ताल के कारण उस मामले में उपस्थित होने से मना नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ऐसा करना:
*professional misconduct,
*professional duty का breach,
*contract का breach और
*client के प्रति trust का breach
हो सकता है। 
महत्वपूर्ण बात
अधिवक्ता व्यक्तिगत रूप से नया brief लेने से मना कर सकता है, लेकिन पहले से लंबित मामले में, जिसमें वह Vakalatnama पर है, केवल Strike Call के कारण अनुपस्थित नहीं रह सकता।
4. Court को Strike के कारण मुकदमा स्थगित करना आवश्यक नहीं:-
यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण निर्देश है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:
Court advocates की strike के कारण proceedings adjourn करने के लिए बाध्य नहीं है।
बल्कि Court का कर्तव्य है कि वह judicial business जारी रखे। यदि advocate strike पर हैं, तब भी Court मामले को आगे बढ़ा सकती है।
इसका सीधा अर्थ है:
"आज Bar Association की हड़ताल है, इसलिए आज सभी cases adjourn होंगे" — यह स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं है।
5. Strike में अनुपस्थित Advocate पर व्यक्तिगत लागत भी लग सकती है:-
यदि कोई Advocate Strike Call के कारण अपने client के मामले में Court में उपस्थित नहीं होता है, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह:
personally costs के लिए liable हो सकता है;
और यदि client को नुकसान हुआ है तो उसके लिए damages की liability भी हो सकती है।
यह व्यक्तिगत liability है; केवल यह कहना कि "Bar Association ने strike का निर्णय लिया था" अपने-आप में पूर्ण बचाव नहीं है।
6. अत्यंत सीमित अपवाद — "Rarest of Rare":-
यहाँ एक महत्वपूर्ण nuance है।
Harish Uppal में Court ने कहा कि सामान्यतः strike/abstention की अनुमति नहीं है। लेकिन यदि मामला Bar अथवा Bench की dignity, integrity और independence से संबंधित अत्यंत गंभीर परिस्थिति का हो, तो Court एक बहुत सीमित अपवाद के रूप में अधिकतम एक दिन के protest abstention को नजरअंदाज कर सकती है। 
लेकिन यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि:
यह अधिवक्ताओं का "अधिकार" नहीं है।
यह कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि Bar Association हर महत्वपूर्ण मुद्दे को "dignity of Bar" बताकर एक दिन की strike करा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह निर्धारित करना Court का कार्य है कि मामला वास्तव में Bar/Bench की dignity, integrity या independence से संबंधित है या नहीं।
7. Strike से पहले Chief Justice/District Judge से consultation:-
यदि ऐसी असाधारण परिस्थिति उत्पन्न होती है जिसमें Bar को लगता है कि मामला वास्तव में Bench/Bar की dignity, integrity अथवा independence से जुड़ा है, तो Harish Uppal के अनुसार Bar के President को पहले संबंधित:
Chief Justice, अथवा
District Judge
से consultation करना चाहिए।
और उस प्रश्न पर Court का निर्णय महत्वपूर्ण माना गया है। 
8. Bar Association को Strike के बजाय वैकल्पिक विरोध करना चाहिए:-
Supreme Court ने कई वैकल्पिक तरीके बताए हैं, जैसे:
*Resolution पारित करना
*Representation देना
*Press Statement
*TV/Media interview
*Silent March
*Dharna
*Relay Fast
*Black/White Armband लगाना
*Court premises के बाहर peaceful protest
*Banner/placard आदि
*लेकिन ऐसा protest Court proceedings को बाधित किए बिना होना चाहिए। 
9. Bar Council of India की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट ने Bar Council of India की 29.09.2002 की Resolution को महत्वपूर्ण माना और सभी Bar Associations को उसके implementation का निर्देश दिया।
साथ ही Court ने कहा कि Advocates की grievances के लिए:-
Taluka level,
District level,
High Court level और
Supreme Court level
पर Grievance Redressal Committees बनाए जाने चाहिए ताकि हर समस्या का समाधान Strike के माध्यम से करने की आवश्यकता न पड़े।
10. High Courts को Rule बनाने का निर्देश:-
Harish Uppal में Supreme Court ने High Courts को Section 34, Advocates Act, 1961 के तहत आवश्यक rules बनाने की बात कही, जिससे Strike के कारण न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप करने वाले advocates के विरुद्ध appropriate action लिया जा सके।
इसका महत्व इसलिए है क्योंकि High Court अपने अधीनस्थ न्यायालयों में Advocates के practice के संबंध में rules बना सकता है।
11. उत्तर प्रदेश में विशेष स्थिति:- उत्तर प्रदेश में भी इस विषय पर न्यायिक प्रशासन ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं:-
Allahabad High Court/High Court administration के circulars में Supreme Court के Harish Uppal सहित विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि District Courts में advocates की strikes के कारण बहुत से working days नष्ट हो रहे हैं और इसे रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। 
12. एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर — "Strike" और "Protest" यह distinction बहुत महत्वपूर्ण है:-
वैध/स्वीकार्य protest:-
Representation + Resolution + Press Conference + Peaceful Dharna + Silent March + Armband आदि
न्यायिक कार्य से विरत/Strike:-
Court में उपस्थित न होना + मामलों की hearing रोकना + Court Boycott + दूसरे advocates को Court जाने से रोकना
दूसरी श्रेणी को Supreme Court ने अत्यंत गंभीरता से लिया है। 
13. वर्तमान स्थिति:- 2024 में Supreme Court ने आगे की व्यवस्था पर भी विचार किया
इस विषय को केवल 2002 का पुराना कानून मानना उचित नहीं होगा। दिसंबर 2024 में Supreme Court के समक्ष advocates' strikes को रोकने के लिए Bar Council of India द्वारा तैयार Draft Rules पर भी विचार हुआ। Court ने संबंधित सुझावों पर विचार कर report प्रस्तुत करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई थी। 
इससे यह स्पष्ट है कि Supreme Court आज भी strike/abstention को न्यायिक प्रशासन के लिए गंभीर समस्या मानता है।

निष्कर्ष:-
कानूनी स्थिति को एक वाक्य में इस प्रकार कहा जा सकता है:
"Bar Association को हड़ताल का प्रस्ताव पारित करने की संगठनात्मक शक्ति हो सकती है, लेकिन उस प्रस्ताव के आधार पर किसी अधिवक्ता को Court में उपस्थित होने से रोकने का अधिकार नहीं है; और Vakalatnama धारण करने वाला Advocate केवल Strike Call के कारण अपने client के मामले से अनुपस्थित नहीं हो सकता।"

Sunday, 10 May 2026

उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए मेडिक्लेम योजना: न्यायपालिका की पहल बनाम सरकारों और बार संस्थाओं की जिम्मेदारी - अंशुमान दुबे (एडवोकेट/रिपोर्टर)

उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए व्यापक मेडिक्लेम/हेल्थ इंश्योरेंस योजना का मुद्दा पिछले दो वर्षों में गंभीर रूप से उभरा है। यह केवल एक कल्याणकारी मांग नहीं रह गई है, बल्कि अब यह न्यायपालिका, बार संस्थाओं और सरकारों की जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है। विशेष रूप से Allahabad High Court ने इस विषय पर सक्रिय हस्तक्षेप करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और निर्देश दिए हैं।

1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?:-
(क) 30 मई 2024 का महत्वपूर्ण आदेश
Allahabad High Court में दायर एक जनहित याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकृत अधिवक्ताओं के लिए कोई समुचित स्वास्थ्य सुरक्षा योजना नहीं है।
याचिका में कहा गया कि—
•अधिवक्ता न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग हैं।
•अनेक अधिवक्ता गंभीर बीमारी, दुर्घटना, हार्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज जैसी स्थितियों में आर्थिक रूप से टूट जाते हैं।
•अन्य राज्यों जैसे Delhi, Madhya Pradesh, Karnataka और Andhra Pradesh में अधिवक्ताओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं उपलब्ध हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई व्यापक व्यवस्था नहीं है।
इस पर हाईकोर्ट की खंडपीठ (जस्टिस राजन रॉय एवं जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला) ने उत्तर प्रदेश सरकार से चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने को कहा और पूछा कि अधिवक्ताओं के लिए बीमा योजना क्यों नहीं बनाई जा सकती। 

2. अगस्त 2024 में हाईकोर्ट का और कड़ा रुख:-
बाद की सुनवाई में न्यायालय ने सीधे Bar Council of Uttar Pradesh से पूछा कि, जब अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा उसका वैधानिक दायित्व है, तो वह मेडिक्लेम योजना क्यों नहीं बना रही?
न्यायालय ने बार काउंसिल से हलफनामा मांगा और स्पष्ट किया कि केवल नामांकन शुल्क लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अधिवक्ताओं के सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर भी कार्य होना चाहिए। 

3. अप्रैल 2026 : हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर PIL दर्ज की:-
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब दो अधिवक्ताओं की गंभीर चिकित्सा स्थितियाँ न्यायालय के सामने आईं—
•एक अधिवक्ता सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए
•दूसरे अधिवक्ता ब्रेन हेमरेज से जूझ रहे थे
•दोनों मामलों में इलाज हेतु धनाभाव की समस्या सामने आई।
इस पर Allahabad High Court ने स्वतः संज्ञान लेते हुए "In Re: Suo Motu Insurance Scheme for Lawyers in State of U.P." नाम से PIL दर्ज करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने पक्षकार बनाया—
•Bar Council of Uttar Pradesh
•Awadh Bar Association
•उत्तर प्रदेश के प्रधान सचिव (विधि)
यह दर्शाता है कि अदालत अब इसे व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि संस्थागत विफलता मान रही है। 

4. बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का रुख:-
Bar Council of India ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर सामूहिक बीमा योजना (Group Insurance Plan) पर कार्य करने की बात कही।
जनवरी 2025 में विभिन्न बार एसोसिएशनों से अधिवक्ताओं का डेटा मांगा गया ताकि एक राष्ट्रीय स्तर की योजना तैयार की जा सके।
यह संकेत देता है कि BCI समस्या को स्वीकार कर चुकी है, लेकिन अभी तक कोई पूर्ण राष्ट्रीय मेडिक्लेम योजना लागू नहीं हो सकी है। 

5. बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का रुख:-
Bar Council of Uttar Pradesh वर्तमान में कुछ सीमित सहायता योजनाएँ चलाती है—
•मृत्यु सहायता
•दुर्घटना सहायता
•वृद्धावस्था सहायता
•सीमित वित्तीय अनुदान
लेकिन यह योजनाएँ मेडिक्लेम का विकल्प नहीं हैं।
गंभीर बीमारियों जैसे—
•कैंसर
•हार्ट सर्जरी
•किडनी ट्रांसप्लांट
•ICU खर्च
के लिए अभी कोई सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा योजना नहीं है। 

6. केंद्र सरकार का रुख:-
Ministry of Law and Justice ने BCI के साथ समन्वय की बात कही है, लेकिन अभी तक कोई अलग केंद्रीय अधिवक्ता स्वास्थ्य बीमा योजना लागू नहीं हुई।
हालांकि केंद्र सरकार कई पेशागत वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चला रही है, लेकिन अधिवक्ताओं के लिए अलग मेडिकल सुरक्षा नीति अभी अधूरी है।

7. उत्तर प्रदेश सरकार का रुख:-
Government of Uttar Pradesh का रुख अब तक अधिकतर “विचाराधीन” दिखाई देता है।
हाईकोर्ट के आदेशों के बाद सरकार ने जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई व्यापक योजना लागू नहीं हुई।
यही कारण है कि न्यायपालिका बार-बार हस्तक्षेप कर रही है।

मूल समस्या क्या है?
भारत में अधिकांश अधिवक्ता—
•स्वरोजगार आधारित हैं।
•नियमित वेतन नहीं पाते।
•निजी स्वास्थ्य बीमा महंगा होता है।
•वृद्ध अधिवक्ताओं की स्थिति और कठिन होती है।
जब बीमारी आती है तो कई अधिवक्ताओं को—
•चंदा
•बार एसोसिएशन सहायता
•व्यक्तिगत उधार
पर निर्भर होना पड़ता है।
यह स्थिति न्याय व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के लिए चिंताजनक है।

आगे क्या होना चाहिए?
एक आदर्श योजना में होना चाहिए—
✅ कैशलेस इलाज
✅ परिवार कवरेज
✅ गंभीर बीमारी कवर
✅ दुर्घटना बीमा
✅ टर्म लाइफ कवर
✅ वरिष्ठ अधिवक्ताओं हेतु विशेष सहायता
✅ प्रीमियम में सरकार + बार काउंसिल + अधिवक्ता का साझा योगदान

☝️निष्कर्ष
Allahabad High Court ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अधिवक्ताओं की स्वास्थ्य सुरक्षा अब टाली नहीं जा सकती।
यदि Bar Council of India, Bar Council of Uttar Pradesh, Government of India और Government of Uttar Pradesh समय रहते ठोस नीति नहीं बनाते, तो न्यायपालिका का दबाव और बढ़ सकता है।

👉न्याय देने वाले अधिवक्ताओं को स्वयं चिकित्सा असुरक्षा में छोड़ देना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

Friday, 8 May 2026

वाराणसी जिला न्यायालय परिसर को वर्तमान स्थान से किसी नये स्थान पर स्थानांतरण के संदर्भ में.........

वाराणसी कचहरी परिसर (जिला न्यायालय परिसर 1913 से कार्यरत हैं।) को वर्तमान स्थान "जिला एवं सत्र न्यायालय, वाराणसी" से किसी नये स्थान पर स्थानांतरित करने की चर्चा पिछले कुछ वर्षों से समय-समय पर उठती रही है। इस विषय में न्यायपालिका, राज्य सरकार, प्रशासन तथा अधिवक्ताओं के संगठनों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं, समाचार रिपोर्टों तथा सामान्य प्रशासनिक तर्कों के आधार पर इस विषय का संकलित आलेख निम्न है:-

1. स्थानांतरण की पृष्ठभूमि : क्यों उठी यह मांग?:-
वर्तमान जिला न्यायालय वाराणसी शहर के अत्यंत व्यस्त क्षेत्र में स्थित है। वर्षों से निम्न समस्याएँ बताई जाती रही हैं—
• अत्यधिक भीड़ एवं यातायात जाम
•पार्किंग की गंभीर समस्या
•न्यायालय भवनों की सीमित क्षमता
•पुराने भवनों की संरचनात्मक चुनौतियाँ
•न्यायिक अधिकारियों, वादकारियों और अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त सुविधाओं का अभाव
•सुरक्षा संबंधी चिंताएँ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा राज्य प्रशासन की ओर से समय-समय पर यह विचार रखा गया कि शहर के बाहरी क्षेत्र में अधिक भूमि लेकर एक आधुनिक न्यायिक परिसर विकसित किया जाए, जहाँ—
•पर्याप्त कोर्ट रूम
•मल्टीलेवल पार्किंग
•रिकॉर्ड रूम
•अधिवक्ता चेंबर
•डिजिटल सुविधाएँ
•बेहतर सुरक्षा व्यवस्था
उपलब्ध हो सके।
ऐसा मॉडल लखनऊ, गौतम बुद्ध नगर आदि कई स्थानों पर नए न्यायालय परिसरों की योजना के संदर्भ में भी देखा गया है।

2. सरकार/प्रशासन की मंशा:- 
राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से कथित रूप से यह तर्क दिया गया कि—
•वर्तमान कचहरी क्षेत्र शहर के मुख्य यातायात मार्गों पर दबाव बढ़ाता है।
•न्यायिक अवसंरचना विस्तार के लिए पर्याप्त भूमि नहीं है।
•भविष्य की न्यायिक आवश्यकताओं को देखते हुए बड़ा परिसर जरूरी है।
कभी-कभी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वैकल्पिक भूमि चिन्हांकन की चर्चाएँ भी स्थानीय स्तर पर सामने आईं।
हालाँकि, हर बार यह स्पष्ट नहीं हुआ कि अंतिम स्वीकृत योजना क्या है और नया स्थान कौन सा होगा। कई प्रस्ताव चर्चा स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए।

3. अधिवक्ताओं का विरोध क्यों?:-
वाराणसी बार एसोसिएशन तथा अन्य अधिवक्ता संगठनों ने विभिन्न समयों पर इसका विरोध किया है। उनके प्रमुख तर्क—
(i) ऐतिहासिक महत्व
वर्तमान कचहरी परिसर वाराणसी की न्यायिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
(ii) आम जनता की पहुँच
शहर के केंद्र में होने के कारण वादकारियों के लिए पहुँचना अपेक्षाकृत आसान है।
(iii) अधिवक्ताओं की आजीविका
वर्तमान परिसर के आसपास हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी है—
•अधिवक्ता
•टाइपिस्ट
•स्टाम्प विक्रेता
•फोटोकॉपी दुकानें
•दस्तावेज लेखक
•छोटे व्यापारी
(iv) बिना परामर्श निर्णय का आरोप
अधिवक्ताओं का कहना रहा है कि उनसे पर्याप्त संवाद किए बिना निर्णय लेने की कोशिश हुई।
(v) चरणबद्ध विकास का विकल्प
कई अधिवक्ताओं ने कहा कि वर्तमान परिसर को ही आधुनिक बनाया जाए।

4. विरोध के तरीके:-
विभिन्न अवसरों पर अधिवक्ताओं द्वारा—
•धरना
•प्रदर्शन
•न्यायिक कार्य से विरत रहना
•ज्ञापन देना
•बार की आपात बैठक
जैसे कदम उठाए गए हैं।
दी बनारस बार एसोसिएशन जैसे संगठनों ने भी इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई है। वर्तमान में दी बनारस बार एसोसिएशन ने अपनी नयी मांग रखी है, बार के पदाधिकारियों का कहना है कि कचहरी के दक्षिण में बनारस क्लब है, उसको कहीं और स्थानांतरित कर, कचहरी परिसर को बनारस क्लब की भूमि पर विस्तारित किया जाए। वहीं दूसरी ओर दी सेन्ट्रल बार एसोसिएशन 'बनारस' वाराणसी के पदाधिकारियों ने मांग की है कि कचहरी परिसर को सेंट्रल जेल की भूमि पर स्थानांतरित कर दिया जाये। वर्तमान में बनारस बार एसोसिएशन ने दिनांक 07-05-2026 को बनारस क्लब के सामने धरना प्रदर्शन किया और आज दिनांक 08-05-2025 को बार भवन से जूलूस निकालकर अपनी मांग को दोहराया।

5. न्यायिक दृष्टिकोण:-
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का प्राथमिक सरोकार सामान्यतः न्यायिक अवसंरचना सुधार होता है।
यदि किसी नए परिसर से बेहतर कार्यक्षमता संभव हो, तो न्यायपालिका उसका समर्थन कर सकती है। लेकिन व्यवहारिक क्रियान्वयन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर निर्भर करता है।

6. वर्तमान स्थिति:-
उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह विषय समय-समय पर पुनः उभरता है, लेकिन अधिवक्ताओं के तीव्र विरोध के कारण अभी तक कोई स्थायी एवं अंतिम स्थानांतरण व्यापक रूप से लागू नहीं हुआ है।
यदि भविष्य में कोई औपचारिक अधिसूचना, भूमि अधिग्रहण या निर्माण योजना आती है, तब स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।

👉 निष्कर्ष  ::  संपादक/रिपोर्ट के व्यक्तिगत विचार कुछ इस प्रकार से हैं:-
वाराणसी कचहरी स्थानांतरण विवाद केवल भवन परिवर्तन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह
•न्यायिक अवसंरचना
•अधिवक्ताओं के हित
•आम जनता की सुविधा
•ऐतिहासिक पहचान
•शहरी विकास
☝️इन सभी प्रश्नों से जुड़ा विषय है।
एक संतुलित समाधान यही हो सकता है, कि उत्तर प्रदेश सरकार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा वाराणसी बार एसोसिएशन आपसी संवाद से ऐसा मॉडल तैयार करें जिसमें न्यायिक सुविधाएँ भी बढ़ें और अधिवक्ताओं के हित भी सुरक्षित रहें (जैसे:- टिन शेड मुक्त परिसर हो, बार भवन हो, अधिवक्ता चेंबर्स/हाॅल हो, मीटिंग के लिए हाॅल हो, लाईब्रेरी हो, कैंटीन हो, अधिवक्ता पार्किंग अलग हो, आदि) तथा ईमानदारी के साथ सामान्य अधिवक्ताओं हर विषय, प्रत्येक मीटिंग की सूचना बार संघों की संयुक्त साधारण सभा में अथवा समाचार पत्रों, सोशल मीडिया, आदि के माध्यम से पारदर्शिता के साथ सूचित किया जाए। संवाद से ही समाधान संभव है, अहम् के द्वंद में किसी का लाभ नहीं है।
- आलेख द्वारा अंशुमान दुबे एडवोकेट/पत्रकार 

Sunday, 3 May 2026

भारत में कोर्ट रूम एवं कोर्ट परिसर के बाहर अधिवक्ताओं के मध्य मारपीट की घटनाएँ: कारण, विधिक स्थिति एवं समाधान

भारत में अधिवक्ता समुदाय को न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। Bar Council of India तथा विभिन्न राज्य बार काउंसिलों द्वारा अधिवक्ताओं को केवल मुकदमों की पैरवी करने वाला पेशेवर नहीं, बल्कि न्याय प्रशासन का अधिकारी (Officer of the Court) भी माना जाता है। ऐसे में जब न्यायालय कक्ष (Court Room) अथवा न्यायालय परिसर के बाहर अधिवक्ताओं के बीच मारपीट, अभद्र व्यवहार या हिंसक झड़प की घटनाएँ सामने आती हैं, तो यह न केवल अधिवक्ता पेशे की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं बल्कि आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास भी प्रभावित करती हैं।

1. बढ़ती घटनाएँ: चिंताजनक प्रवृत्ति:- पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ:-
👉अदालत की बहस के दौरान वकीलों में हाथापाई हुई,
👉बार एसोसिएशन चुनावों के दौरान हिंसा हुई,
👉चेंबर विवाद, फीस विवाद या व्यक्तिगत मतभेद के कारण मारपीट हुई,
👉सोशल मीडिया पोस्ट या पेशेवर प्रतिस्पर्धा के कारण अधिवक्ता आपस में भिड़ गए।
👉उदाहरणस्वरूप: 
🔹Tis Hazari Courts में अधिवक्ताओं और पुलिस के बीच हिंसक घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा उत्पन्न की।
🔹Saket District Court में भी अधिवक्ताओं के बीच तनाव की घटनाएँ रिपोर्ट हुईं।
🔹कई जिला न्यायालयों—विशेषकर छोटे शहरों—में बार चुनावों के दौरान झड़पें सामने आती रही हैं।
हालाँकि सभी घटनाएँ व्यापक स्तर पर रिपोर्ट नहीं होतीं, परंतु स्थानीय समाचारों और बार संघों के रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि यह समस्या वास्तविक है।

2. कारण:-
(i) पेशेवर प्रतिस्पर्धा
मुवक्किल, केस और आर्थिक हितों को लेकर प्रतिस्पर्धा कई बार व्यक्तिगत शत्रुता में बदल जाती है।
(ii) बार राजनीति
Bar Council of India तथा स्थानीय बार एसोसिएशनों के चुनावों में गुटबाजी हिंसा का कारण बनती है।
(iii) अनुशासनात्मक तंत्र की कमजोरी
कई बार शिकायत होने के बावजूद समयबद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होती।
(iv) तनाव एवं मानसिक दबाव
लंबित मुकदमे, आर्थिक अस्थिरता और पेशेगत तनाव व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
(v) न्यायालयी मर्यादा का क्षरण
वरिष्ठ-जूनियर परंपरा में आई गिरावट और पेशागत नैतिकता की कमी भी कारण है।

3. विधिक स्थिति:-
👉 Advocates Act, 1961 के अंतर्गत राज्य बार काउंसिल किसी अधिवक्ता के विरुद्ध पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) पर कार्रवाई कर सकती है।
👉धारा 35 के अंतर्गत—
🔹चेतावनी
🔹निलंबन
🔹नामांकन समाप्ति तक की कार्रवाई संभव है।
👉भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिता
🔹यदि मारपीट होती है तो निम्न अपराध बन सकते हैं—
🔹साधारण मारपीट
🔹गंभीर चोट
🔹आपराधिक धमकी
👉लोक सेवक के कार्य में बाधा (यदि न्यायिक कार्य बाधित हो)
🔹वर्तमान में Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के प्रावधान लागू होते हैं।
🔹Contempt of Court
यदि कोर्ट कार्यवाही बाधित होती है तो Contempt of Courts Act, 1971 के तहत कार्यवाही संभव है।

4. न्यायपालिका की दृष्टि:-
Supreme Court of India ने कई निर्णयों में कहा है कि वकीलों की हड़ताल, हिंसा और न्यायिक कार्य में बाधा अस्वीकार्य है।
👉विशेष रूप से:
Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वकीलों की हड़ताल और कार्य बाधा न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है।
👉हिंसक व्यवहार इसी सिद्धांत के विरुद्ध माना जा सकता है।

5. प्रभाव:-
👉न्याय व्यवस्था पर
🔹सुनवाई प्रभावित होती है
🔹मामलों में देरी होती है
🔹मुवक्किलों पर
🔹विश्वास कम होता है
🔹आर्थिक नुकसान होता है
👉अधिवक्ता पेशे पर
🔹गरिमा में गिरावट
🔹युवा वकीलों पर नकारात्मक प्रभाव

6. समाधान:-
(i) कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई
बार काउंसिल को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।
(ii) CCTV एवं सुरक्षा
कोर्ट परिसरों में बेहतर निगरानी व्यवस्था हो।
(iii) मध्यस्थता तंत्र
बार संघों में विवाद समाधान समिति बनाई जाए।
(iv) नैतिक प्रशिक्षण
नए अधिवक्ताओं को पेशेवर आचार संहिता का प्रशिक्षण दिया जाए।
(v) वरिष्ठों की भूमिका
वरिष्ठ अधिवक्ताओं को मार्गदर्शन एवं अनुशासन बनाए रखने में सक्रिय होना चाहिए।

👉निष्कर्ष:- अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग होता है। यदि न्यायालय परिसर स्वयं हिंसा का स्थल बन जाए तो यह लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

अतः आवश्यक है कि Bar Council of India, राज्य बार काउंसिल, न्यायपालिका तथा स्वयं अधिवक्ता समुदाय इस समस्या को गंभीरता से लें और न्यायालय की गरिमा बनाए रखें।

“जहाँ विधि के संरक्षक ही विधि का उल्लंघन करने लगें, वहाँ न्याय की प्रतिष्ठा संकट में पड़ जाती है।”

आलेख द्वारा - अंशुमान दुबे एडवोकेट 

Friday, 17 April 2026

भारत में “Advocates Protection Act” : आवश्यकता, वर्तमान स्थिति और आगे की राह (सम्पादकीय लेख)

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में न्यायपालिका की मजबूती केवल न्यायाधीशों पर ही नहीं, बल्कि अधिवक्ताओं (Advocates) पर भी समान रूप से निर्भर करती है। अधिवक्ता न्याय व्यवस्था की रीढ़ हैं—वे न केवल अपने मुवक्किल का पक्ष रखते हैं, बल्कि न्यायालय को सही तथ्यों और विधिक दृष्टिकोण से अवगत भी कराते हैं। ऐसे में अधिवक्ताओं की सुरक्षा एक गंभीर और समयोचित विषय बन चुका है।

अधिवक्ताओं की सुरक्षा: एक बढ़ती चिंता
पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से अधिवक्ताओं पर हमले, धमकी, उत्पीड़न और यहां तक कि हत्या के मामले सामने आए हैं। ये घटनाएँ न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का प्रश्न उठाती हैं, बल्कि न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
जब अधिवक्ता भय के माहौल में कार्य करेंगे, तो वे न तो अपने मुवक्किल के हितों की रक्षा कर पाएंगे और न ही न्यायालय के समक्ष निर्भीकता से तथ्य प्रस्तुत कर पाएंगे।

Advocates Protection Act की आवश्यकता क्यों?
वर्तमान में भारत में अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए कोई विशेष केंद्रीय कानून नहीं है। भारतीय दंड संहिता (IPC) और अन्य सामान्य कानून लागू होते हैं, परंतु वे अधिवक्ताओं के पेशेगत जोखिमों को ध्यान में रखकर नहीं बनाए गए हैं।

Advocates Protection Act की मांग निम्नलिखित कारणों से उठती रही है:-
*अधिवक्ताओं को पेशेगत कार्य करते समय विशेष सुरक्षा प्रदान करना
*न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप या दबाव को रोकना
*अधिवक्ताओं के खिलाफ हिंसा या उत्पीड़न पर कठोर दंड का प्रावधान
*पुलिस और प्रशासन को स्पष्ट दिशा-निर्देश देना

कुछ राज्यों की पहल:-
दिलचस्प बात यह है कि कुछ राज्यों ने इस दिशा में पहल की है। उदाहरण के लिए:

राजस्थान ने “Advocates Protection Act” पारित किया है।
अन्य राज्यों में भी इस तरह के विधेयक प्रस्तावित या विचाराधीन रहे हैं। हालांकि, एक समान राष्ट्रीय कानून का अभाव अब भी महसूस किया जा रहा है।

केंद्र स्तर पर स्थिति:-
देशभर के अधिवक्ता संगठन लंबे समय से केंद्र सरकार से इस विषय पर एक व्यापक कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और विभिन्न बार एसोसिएशनों ने समय-समय पर आंदोलन और ज्ञापन भी दिए हैं।
फिर भी, अभी तक संसद में ऐसा कोई सर्वमान्य केंद्रीय कानून पारित नहीं हो पाया है।

एक प्रभावी Advocates Protection Act में निम्न प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं:-
*अधिवक्ताओं पर हमले को गंभीर अपराध (non-bailable offence) घोषित करना
*त्वरित जांच और विशेष अदालतों का गठन
*अधिवक्ताओं के कार्यालय, दस्तावेज और परिवार की सुरक्षा
*दोषियों के लिए कठोर दंड और मुआवजे का प्रावधान
*पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने में देरी पर जवाबदेही तय करना

आलोचना और संतुलन:-
कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि किसी एक पेशे के लिए विशेष कानून बनाना अन्य पेशों के साथ असमानता हो सकती है। यह तर्क अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी सच है कि अधिवक्ता न्यायिक प्रणाली का अभिन्न अंग हैं और उनकी सुरक्षा सीधे न्याय तक पहुँच से जुड़ी है।
इसलिए, इस कानून को बनाते समय संतुलन और दुरुपयोग रोकने के उपाय भी शामिल किए जाने चाहिए।

निष्कर्ष:-
Advocates Protection Act केवल अधिवक्ताओं की सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और प्रभावशीलता से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
आज आवश्यकता है कि केंद्र सरकार, न्यायपालिका और अधिवक्ता संगठनों के बीच समन्वय स्थापित कर एक व्यापक, संतुलित और प्रभावी कानून बनाया जाए।
जब अधिवक्ता सुरक्षित होंगे, तभी न्याय व्यवस्था सशक्त और जनता का विश्वास अटूट रहेगा।
- अंशुमान दुबे एडवोकेट 

23 साल की वकालत का अनुभव: चेहरे बदलते रहे, व्यवस्था नहीं!

बार एसोसिएशन से बार काउंसिल तक—वादों, स्वार्थ और व्यवस्था के पतन का एक कटु अनुभव। वकालत करते हुए 23 वर्ष बीत गए। इस दौरान बार एसोसिएशन के अन...