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Thursday, 18 July 2019

देवी देवताओं की आरती के बाद, क्यों बोलते हैं कर्पूरगौरं करुणावतारं मंत्र

हिंदू धर्म को मानने वाले श्रद्धालु मंदिरों में या घरों में होनी वाली दैनिक पूजा विधान में देवी देवताओं की आरती पूर्ण होने के बाद कुछ वैदिक मंत्रों का उच्चारण अनिवार्य रूप से करते है । सभी देवी-देवताओं की स्तुति के मंत्र भी अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी यज्ञ या पूजा समपन्न होता है, तो उसके बाद भगवान की आरती की जाती और आरती के पूर्ण होते ही इस दिव्य व अलौकिक मंत्र को विशेष रूप से बोला जाता है ।

कर्पूरगौरं मंत्र:-

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि ।।

- इस अलौकिक मंत्र के प्रत्येक शब्द में भगवान शिवजी की स्तुति की गई हैं । इसका अर्थ इस प्रकार है- कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले । करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं । संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं । भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं । सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है ।

अर्थात- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है ।

आखिर आरती के बाद यही मंत्र क्यों

- किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं मंत्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं । भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है । ये माना जाता है कि भगवान शिव जी शमशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी प्रवत्ति वाला है । लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य और सुंदर है । भगवान शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति । ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे, शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं । ऐसे शिवजी हमारे मन में शिव वास कर, मृत्यु का भय दूर करें ।

Friday, 14 June 2019

ब्राह्मण समाज के तथाकथित ठेकेदार फिल्म Article 15 का विरोध कर रहे हैं:-

अरे स्वयंभू विद्वानों यह बेटियों के ऊपर हुये अत्याचार पर बनी फिल्म है, जहाँ तक मेरी जानकारी है।

आप सबसे सादर सविनय निवेदन है कि, विरोध करके अभिव्यक्ति की आजादी का हनन न करे। आप लोगों के इन कृत्यों से हर सामान्य ब्राह्मण का अपमान होता है। "भारतीय संविधान का Article 15 क्या कहता है, वह आप सबके लिए उपलब्ध है:-
भारतीय संविधान अनुच्छेद 15 (Article 15 in Hindi) - धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध:-
विवरण
(1) राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।
(2) कोई नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर--
(क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश, या
(ख) पूर्णतः या भागतः राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग,
के संबंध में किसी भी निर्योषयता, दायित्व, निर्बन्धन या शर्त के अधीन नहीं होगा।
(3) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।
[(4) इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 के खंड (2) की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।]
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संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 2 द्वारा जोड़ा गया।

Monday, 10 June 2019

संविधान में दिये गये मूल कर्तव्य समस्त भारतीयों पर लागू होते हैं, चाहे वह जनता हो अथवा प्रधान सेवक:-

भारतीय संविधान अनुच्छेद 51A :: मूल कर्तव्य:- भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह-

(क) संविधान का पालन करे और उस के आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे ;
(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उन का पालन करे;
(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे;
(घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;
(ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है;
(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उस का परिरक्षण करे;
(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिस के अंतर्गत वन, झील नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उस का संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे;
(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;
(झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;
(ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिस से राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले;
(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा का अवसर प्रदान करे।

Wednesday, 22 May 2019

Aawaz Deke Hamen Tum Bulao लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी

आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ
मोहब्बत में इतना ना हमको सताओ
आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ
मोहब्बत में इतना ना हमको सताओ

अभी तो मेरी ज़िंदगी है परेशां
कहीं मर के हो खाक भी न परेशां
दिये की तरह से न हमको जलाओ
मोहब्बत में इतना ना हमको सताओ

मैं सांसों के हर तार में छुप रहा हूँ
मैं धड़कन के हर राग में बस रहा हूँ
ज़रा दिल की जानिब निगाहें झुकाओ
मोहब्बत में इतना ना हमको सताओ

ना होंगे अगर हम तो रोते रहोगे
सदा दिल का दामन भिगोते रहोगे
जो तुम पर मिटा हो उसे ना मिटाओ
मोहब्बत में इतना ना हमको सताओ
आवाज़ देके हमें तुम बुलाओ
मोहब्बत में इतना ना हमको सताओ

सब्र और सच्चाई

‘सब्र’ और ‘सच्चाई’ एक ऐसी सवारी है,
जो अपने सवार को कभी गिरने नहीं देती,
ना किसी के कदमो में,
और ना किसी की नज़रों में...!!

कबीर

कबीर के literature काे भी तत्समय poor की संज्ञा दिया गया था। आज वर्षों बाद कबीर के विचार जीवित हैं परन्तु विरोधियों का ना ताे विचार रहा और ना ही उनका अस्तित्व।
कबीर कहते हैं-
चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस।
ते मुक्ता कैसे चुगे, पड़े काल के फंस।।
भावार्थ:-
जो बगुले के आचरण में चलकर, पुनः हंस कहलाते हैं वे ज्ञान - मोती कैसे चुगेगे ? वे तो कल्पना काल में पड़े हैं।

Monday, 13 May 2019

ऐ मालिक तेरे बंदे हम - भरत व्यास

ऐ मालिक तेरे बंदे हम

ऐसे हो हमारे करम
नेकी पर चलें
और बदी से टलें
ताकि हंसते हुये निकले दम

जब ज़ुलमों का हो सामना
तब तू ही हमें थामना
वो बुराई करें
हम भलाई भरें
नहीं बदले की हो कामना
बढ़ उठे प्यार का हर कदम
और मिटे बैर का ये भरम
नेकी पर चलें

ये अंधेरा घना छा रहा
तेरा इनसान घबरा रहा
हो रहा बेखबर
कुछ न आता नज़र
सुख का सूरज छिपा जा रहा
है तेरी रोशनी में वो दम
जो अमावस को कर दे पूनम
नेकी पर चलें

बड़ा कमज़ोर है आदमी
अभी लाखों हैं इसमें कमीं
पर तू जो खड़ा
है दयालू बड़ा
तेरी कृपा से धरती थमी
दिया तूने हमें जब जनम
तू ही झेलेगा हम सबके ग़म
नेकी पर चलें 

Friday, 10 May 2019

मेरे राम को खण्डित करने वाले सदैव दण्डित होते हैं:-

राम को खण्डित करने वाले सदैव दण्डित होते हैं। इस वाक्य से इस पोस्ट की शुरुआत कर रहा हूँ, क्योंकि यह सत्य है। इतिहास गवाह है, जिस किसी ने "राम-नाम" को खण्डित करने का प्रयास किया वह स्वयं खण्डित हो गया।
मैं सिर्फ उस इतिहास की बात करता हूँ जो मैंने अपने 44 साल के जीवन में देखा व सुना है।
***पहली घटना जिसने राम-नाम की राजनीति में ताला खुलवाया, उसका शरीर खण्ड-खण्ड हो गया।
***दूसरी घटना, जिसने राम-नाम पर रथयात्रा निकालकर राजनीति की, उनके प्रधान बनने का सपना तीन बार खण्ड-खण्ड हो गया।
***तीसरी घटना जिसका दायित्व था कि उसे राम-नाम की राजनीति को रोकना है, उसने ऐसा नहीं किया तो उसके ही लोगों ने उसे मरने के बाद राजघाट, दिल्ली के बाहर फेंक दिया।

इसलिए राम-नाम की राजनीति बंद करो और राम का नाम लेकर राम की जनता के लिए काम करो।

Sunday, 21 April 2019

उच्चतम न्यायालय ख़तरे में! अब कोई संस्थान नहीं बचा!"

माननीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आदरणीय श्री रंजन गोगोई जी का बयान, "उच्चतम न्यायालय ख़तरे में! अब कोई संस्थान नहीं बचा!"

मैं यह नहीं जानता कि, न्यायमूर्ति गोगोई साहब गलत हैं। मैं यह भी नहीं जानता कि, आरोप लगाने वाली महिला सच बोल रही है। लेकिन वकालत जीवन के सोलह साल में मैंने यह अनुभव जरुर किया कि, जिस प्रकार का आरोप गोगोई साहब पर लगाया गया, वह असाधारण आरोप है।
भारतीय न्यायपालिका की सर्वोच्च सत्ता को भी उस सामान्य भारतीय की तरह सड़क पर ला खड़ा कर  दिया जो इस प्रकार के आरोपों से रोजाना दो चार होते रहते हैं। मित्रता सूची में मेरे साथ कई न्यायाधीशगण भी जुड़े हैं और गोगोई साहब पर लगे इस प्रकार के आरोप से हथप्रभ भी हुए होंगे। होना भी लाजिमी है। सवाल उनके शीर्ष अधिकारी के सम्मान का जो है लेकिन जब यही आरोप किसी राजनीतिक षड्यंत्र के तहत, किसी जमीनी विवाद के तहत अथवा किसी प्रतिशोध की भावना के तहत एक सामान्य जीवन जीने वाले इंसान पर लगता है तो इसका दर्द वह आरोपी व्यक्ति, उसका परिवार, उससे जुड़े लोग महसूस कर सकते हैं। भारतीय न्यायपालिका कत्तई यह मीमांसा करने का जहमत नहीं उठाती कि आरोप में सत्यता कितनी है, आरोपी का सामाजिक स्तर क्या है, आरोपी के परिजनों की मनःस्थिति पर आरोप का क्या असर पडे़गा, उसके बेटे बेटी के भविष्य को कहां तक यह आरोप प्रभावित करेगा।   वकील लाख दलील देता रहे लेकिन कानून की धाराओं का ज्ञान देकर, धारा 164 में झूठे तौर पर किए गए कथनों का हवाला देकर आरोपी का जमानत आवेदन अस्वीकार कर दिया जाता है और एक झूठे मुकदमें में फंसाए गए निर्दोष व्यक्ति का परिवार न्यायालय दर न्यायालय भटकता रहता है। यहां तक कि इस प्रकार के झूठे आरोपों पर मैंने सजा होते भी देखा है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर लगे इस आरोप ने हमारी न्याय व्यवस्था को देर से ही सही लेकिन आइना दिखाने का काम किया है। अब समय आ चुका है न्यायपालिका को इस प्रकार के मामलों में अपनी सोच बदलने का। अब समय आ गया है समाज को अपनी आंख से न देखकर सामाजिक व्यवहार विचार और परम्पराओं की दृष्टि से देखने का। अब समय आ गया है आरोपी के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने का नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब स्त्री पुरुष के सामाजिक  रिश्तों की हत्या होगी और पुरुष समाज किसी भी स्त्री से सार्वजनिक जीवन में किसी भी प्रकार का सम्बन्ध या रिश्ता रखने से परहेज करेगा और अन्त में यही कहेगा - जान बची तो लाखों पाये।

Wednesday, 28 November 2018

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् :-

ॐ = प्रणव
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला
स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला
तत = वह
सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल
वरेण्यं = सबसे उत्तम
भर्गो = कर्मों का उद्धार करने वाला
देवस्य = प्रभु
धीमहि- = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान)
धियो = बुद्धि
यो = जो
नः = हमारी
प्रचो- दयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना)

।।ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।।

Monday, 12 November 2018

जानिए, काशी के इतिहास की वो तिथियां जिन्होंने बदल दिया बनारस को:-

800 ई0पू0    राजघाट (वाराणसी) में प्राचीनतम बस्ती और मिट्टी के तटबंध के पुरावशेष
8वीं सदी ई0पू0     तेईसवें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ का काशी में जन्म।
7वीं सदी ई0पू0 काशी-एक स्वतंत्र महाजनपद।
625 ई0पू0    काशी सारनाथ में सर्वप्रथम भगवान बुद्ध ने बौद्धधर्म का उपदेश दिया था।
405 ई0पू0    चीनी यात्री फाह्यान का काशी में  आगमन हुआ।
340 ई0पू0    सम्राट अशोक की वाराणसी-यात्रा। सारनाथ में अशोक-स्तंभ और धम्मेख तथा धर्मराजिक स्तूपों की स्थापना।
1 ई0 से 300 ई0   राजघाट के पुरावशेषों के आधार पर वाराणसी के इतिहास में समृद्धि का काल।
सन् 302  मणिकर्णिका घाट का निर्माण हुआ था
816 ई0    आदि जगदगुरू शंकराचार्य का काशी में आगमन हुआ।
सन् 580  पचगंगा घाट का निर्माण हुआ।
12वीं सदी काशी पर गहड़वालों का शासन। गहड़वाल नरेश गोविन्दचंद्र के राजपंडित दामोदर द्वारा तत्कालीन   लोकभाषा (कोसली) में उक्तिव्यक्ति प्रकरण की रचना। गोविंदचंद्र की रानी कुमारदेवी ने सारनाथ में विहार     बनवाया। गहडवाल युग में काशी के   प्रधान देवता अविमुक्तेश्वर शिव की विश्वेश्वर में तब्दीली।
सन् 1193 काशीराज जयचंद की मृत्यु।
सन् 1194 कुतुबुद्दीन का काशी पर आक्रमण हुआ, जिसने विष्णु-मंदिर को तोड़कर ढाई कंगूरे की मस्जिद बनवा दी।
सन् 1194 व 1197  काशी पर शहाबुद्दीन और कुतुबुद्दीन ऐबक के हमले। काशी की भारीलूट। गहडवालों का अंत।
सन् 1248 दूसरी बार मुहम्मद गोरी का आक्रमण हुआ।
सन् 1393 माघ शुक्ल पूर्णिमा को काशी में रविदास का जन्म हुआ।
सन् 1516 फरवरी माह में चैतन्य महाप्रभु का काशी में आगमन हुआ, जहाँ पर ठहरे थे वह स्थान चैतन्य वट के नाम से प्रसिद्ध है।

सन् 1526    बाबर ने इब्राहीम लोदी को पराजित   करने के बाद काशी पर भी आक्रमण किया।
सन् 1531 बनारस व सारनाथ में हुमायूं का डेरा।
सन् 1538 बनारस पर शेरशाह की चढ़ाई।
सन् 1553 सिख सम्प्रदाय के प्रथम गुरु श्री गुरूनानक देव जी का काशी आगमन हुआ और  काशी में कई वर्ष़ों तक        ठहरे थे। यह स्थान आज गुरुबाग के नाम से प्रसिद्ध है।
सन् 1565 काशी पर बादशाह अकबर का कब्जा।
सन् 1583-91  प्रथम अंग्रेज यात्री रॉल्फ फिच की वाराणसी-यात्रा।
सन् 1584 काशी में ज्ञानवापी स्थित प्राचीन विश्वेश्वर मन्दिर का निर्माण दिल्ली सम्राट अकबर के दरबारी राजा       टोडरमल के द्वारा हुआ।
सन् 1585 राजा टोडरमल और नारायण भट्ट की मदद से विश्वनाथ मंदिर का पुननिर्माण।
सन् 1600 राजा मान सिंह द्वारा काशी में मानमंदिर और घाट का निर्माण।
सन् 1623 सोमवंशी राजा वासुदेव के मंत्री नरेणु रावत के पुत्र श्री नारायण दास के दान से काशी में मणिकर्णिका घाट    स्थित चक्रपुष्करणी तीर्थ का निर्माण हुआ।
सन् 1642 विंदुमाधव मन्दिर ( प्रथम ) का निर्माण जयपुर के राजा जयसिंह द्वारा हुआ।
सन् 1656     दारा शिकोह की बनारस यात्रा।
सन् 1666   औरंगजेब की आगरा-कैद से भागकर छत्रपति शिवाजी कुछ दिन काशी में ठहरे।
सन् 1669   औरंगजेब के आदेश से विश्वनाथ मंदिर गिरा कर उसके स्थान पर ज्ञानवापी की मस्ज़िद उठा दी गई।   बिंदुमाधव का मन्दिर भी गिराकर वहां मस्जिद बनाई गई।
सन् 1669 औरंगजेब के शासन काल में उसकी आज्ञा से ज्ञानवापी का विश्वेश्वर मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1669 छत्रपति शिवाजी आगरे के किले से औरंगजेब को चकमा देकर कैद से निकल कर सीधे काशी आये। यहाँ    आकर पंचगंगा घाट पर स्नान किया।
सन् 1673 काशी में औरंगजेब द्वारा बेनी माधव का मन्दिर तोड़ा गया।
सन् 1699 आमेर के महाराज सवाई जयसिंह के द्वारा काशी में पंचगंगा घाट पर राम मन्दिर बनवाया था।
सन् 1714 गंगापुर ग्राम में कार्त्तिक कृष्ण पक्ष में काशीराज महाराज बलवन्त सिंह का जन्म हुआ।
सन् 1725 काशी राज्य की स्थापना।
सन् 1734 नारायण दीक्षित पाटणकर का वाराणसी आगमन; उन्होंने यहां कई घाट बनवाए।
सन् 1737 महाराजा जयसिंह नें मानमन्दिर वेधशाला का निर्माण कराया।
सन् 1740 बलवन्त सिंह के पिता श्री मनसाराम का देहावसान हो गया।
सन् 1741-42  गंगापुर में तत्कालीन काशीराज द्वारा दुर्ग का निर्माण कराया गया।
सन् 1737 सवाई जयसिंह द्वारा मानमंदिर- वेधशाला की स्थापना।
सन् 1747 महाराज बलवन्त सिंह ने चन्देल वंशी राजा को पराजित कर विजयगढ़ पर अधिकार किया।
सन् 1752 काशीराज बलवंत सिंह द्वारा रामनगर किले का निर्माण।
सन् 1754 महाराज बलवन्त सिंह ने पलिता दुर्ग पर विजय पाया।
सन् 1755 बंगाल, नागौर राज्य की रानी भवानी के द्वारा पंचक्रोशी स्थित कर्दमेश्वर महादेव के सरोवर का निर्माण हुआ।
सन् 1756 रानी भवानी ने भीमचण्डी के सरोवर का निर्माण करवाया।
सन् 1770 21 अगस्त का महाराज बलवन्त सिंह का स्वर्गवास हुआ।
सन् 1770 से 1781 तक काशी पर महाराज चेतसिंह का शासन था।
सन् 1777 महारानी अहिल्याबाई ने विश्वनाथ मंदिर का नवनिर्माण कराया।
सन् 1781 16 अगस्त को काशी में शिवाला घाट पर अंग्रेजी सेना से राजा चेतसिंह के सिपाहियों का संघर्ष हुआ। यह विद्रोह राजभक्त नागरिकों द्वारा मारे गये। 19 अगस्त, 1781 को काशी की देश भक्त जनता की क्रांति से भयभीत होकर वारनेहेस्टिंग्स जनाने वेश में नौका द्वारा चुनार भाग गया। दिसम्बर, सन् 1781 से 1794 तक काशी राज्य पर   महाराज महीप नारायण का राज्य था।
सन् 1785 काशी में महारानी अहिल्या बाई द्वारा विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण हुआ। सन् 1787-1795    जोनाथन डंकन बनारस के रेजिडेंट।
सन ~ 1787   काशी में प्रथम बार भूमि का बन्दोबस्त    मिस्टर डंकन साहब के द्वारा हुआ जो डंकन बन्दोबस्त के नाम से जाना जाता है।
सन् 1791 वाराणसी में संस्कृत पाठशाला (अब संस्कृत विश्व विद्यालय) का प्रस्ताव जोनाथन डंकन ने रखा था।
सन् 1794 काशी राजकीय संस्कृत विद्यालय (क्वींस कालेज) की स्थापना।
सन् 1802 बनारस की पहली पक्की एवं मुख्य सड़क दालमण्डी, राजादरवाजा, काशीपुरा, औसानगंज होते हुये जी.टी. रोड तक बनाई गई।
सन् 1814 बनारस में लार्ड हेस्टिंग्स का आगमन और दरबार।
सन् 1816 पश्चिम बंगाल के राजा जयनारायण द्वारा रेवड़ी तालाब मुहल्ले में अंग्रेजी भाषा के प्रथम विद्यालय ’जयनारायण हाईस्कूल’ (वर्तमान में यह इण्टर कालेज) की स्थापना।
सन् 1818 काशी के अस्सी मुहल्ले में रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।
सन् 1820 वर्तमान न्यायालय भवन (कलेक्ट्री कचहरी) का निर्माण हुआ।
सन् 1822 जेम्स प्रिंसेप ने बनारस का सर्वेक्षण किया।सन् 1825 बाजीराव पेशवा द्वितीय ने कालभैरव मन्दिर का निर्माण कराया।
सन् 1827 फारसी शायर मिर्जा गालिब का काशी में आगमन, जो वर्तमान घुघरानी गली में ठहरे थे।
सन् 1828 ज्ञानवापी के खंडित सरोवर की रक्षा हेतु ग्वालियर की रानी बैजबाई ने एक कूप बनवाया।
सन् 1828-29  जेम्स प्रिंसेप द्वारा बनारस की जनगणना; कुल आबादी-1,80,000
सन् 1830 विश्वेश्वरगंज स्थित गल्ला मण्डी (अनाज की सट्टी) का निर्माण हुआ।
सन् 1835 काशीराज महाराज ईश्वरी नारायण सिंह राज्य पर बैठे तथा 1889 में उनका स्वर्गवास हुआ।
सन् 1839 पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के   द्वारा काशी विश्वनाथ मन्दिर के कलश पर स्वर्ण-पत्र-चढ़ाया गया।
सन् 1845 बनारस का पहला सप्ताहिक समाचार पत्र ’बनारस’ प्रकाशित हुआ।
सन् 1853 वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन का निर्माण पूरा हुआ।
सन् 1866 काशी म्यूनिसिपल बोर्ड (नगर पालिका) की स्थापना हुई।
सन् 1867 काशी में प्रथम बार चुंगी (कर) लगी।
सन् 1869 22 अक्टूबर को काशी में स्वामी दयानन्द सरस्वती का आगमन हुआ। 17 नवम्बर सन् 1869 को दुर्गा कुण्ड पर राजा माधव सिंह बाग में विद्वानों से शाóार्थ हुआ।
सन् 1872 कमिश्नर सी.पी. कारमाइकल के नाम पर ज्ञानवापी में कारमाइकल लाइब्रेरी की स्थापना।
सन् 1875 कुमार विजयनगरम् श्री गजपति सिंह के द्वारा टाउनहाल का निर्माण हुआ।  जिसका उद्घाटन सन् 1876 में प्रिस ऑफ वेल्स के द्वारा हुआ।
सन् 1880-87  राजघाट पुल का निर्माण हुआ।
सन् 1882 नागरी प्रचारिणी सभा पुस्तकालय एवं बंग साहित्य पुस्तकालय की स्थापना।
सन् 1882 काशी में गंगा की अधिक बाढ़ हुई थी। कोदई-चौकी तक नावें चली थीं।
सन् 1885 काशी में कांग्रेस कमेटी की स्थापना हुई। इसकी प्रथम बैठक रामकली चौधरी के बाग में हुई थी। जिसके    सदस्य डॉ0 छन्नू लाल, बसीउद्दीन मुख्तार, मु0 माधोलाल, उपेन्द्रनाथ, वृन्दावन वकील थे।
सन् 1887 राजघाट स्थित गंगा पर रेल-सड़क पुल का उद्घाटन।
सन् 1888 काशी यात्रा के लिये स्वामी विवेकानन्द का आगमन हुआ।
सन् 1889 से 1931 तक काशी राज्य पर महाराज प्रभुनारायण सिंह का राज्य था
सन् 1890 भेलुपुर स्थित जल संस्थान का महारानी विक्टोरिया के पौत्र प्रिंस एलबर्ट विक्टर द्वारा शिलान्यास।
सन् 1891 सारनाथ में अनागारिक धर्मपाल द्वारा महाबोधि संस्था स्थापित हुई।
सन् 1892 14 नवम्बर को तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर द्वारा भेलुपुर जल संस्थान का उद्घाटन।
सन् 1893 ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना।
सन् 1897 पादरी जानसन के द्वारा काशी में गिरजाघरों का निर्माण हुआ। प्रथम-सिगरा, दूसरा-गोदौलिया का।
सन् 1898 आर्यभाषा पुस्तकालय की स्थापना।
सन्  1904  तत्कालीन काशी नरेश की अध्यक्षता में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापना के लिये पहली बैठक हुई।
सन् 1910 काशी में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई।
सन् 1910 सारनाथ संग्रहालय का निर्माण कराया गया।
सन् 1916 पं0 मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना।
सन् 1918 काशी में प्रथम सिनेमा घर का निर्माण बैजनाथ दास शाहपुरी द्वारा बांसफाटक पर मदन थियेटर के नाम से हुआ।
सन् 1920 काशी विद्यापीठ की स्थापना।
सन् 1920 महात्मा गांधी काशी में आये और तीन दिनों तक ठहरे।
सन् 1921 10 फरवरी को गांधी जी का पुनः काशी    आगमन हुआ। तीसरी बार 1921 में उन्होंने विद्यापीठ का शिलान्यास किया।
सन् 1925 26 दिसम्बर को काकोरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में वाराणसी में अनेक लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसमें काशी के राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दी गयी।
सन् 1928 वाराणसी मे बिजलीकरण।
सन् 1931 जून मे प्रथम बार नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का आगमन हुआ। दशाश्वमेध स्थित चितरंजन दास पार्क में अभिमन्यु दल द्वारा मानपत्र दिया गया। टाउनहाल के मैदान में नव जवान भारत सभा की ओर से एक सभा हुई।
सन् 1933-34  रिक्षे की सवारी की शुरुआत ‘दी रेस्टोंरेंट’ के मालिक बद्री बाबू नें की।
सन् 1934 13 जनवरी को काशी में भूकम्प आया।
सन् 1934 28 दिसम्बर को राजा बलदेव दास बिड़ला के दान से सारनाथ में एक धर्मशाला का निर्माण हुआ।
सन् 1937 ‘भारतमाता मन्दिर’ का महात्मा गांधी द्वारा उद्घाटन।
सन् 1939 काशी राज्य में प्रजा की माँग पर काशी नरेश श्री महाराज आदित्य नारायण सिंह ने प्रजा परिषद की घोषणा की।
सन् 1940 राजघाट (वाराणसी) के उत्खनन की शुरूआत।
सन् 1948 15 अक्टूबर को बनारस राज्य का भारतीय संघ में विलय हुआ।
सन् 1956 बुद्ध-पूर्णिमा के दिन ‘बनारस’ को अधिकृत रूप से पुराना ‘वाराणसी’ नाम दिया गया।
सन् 1964 तुलसी मानस मन्दिर (दुर्गाकुण्ड के    पास) का निर्माण हुआ।
सन् 1986 काशी में हरिश्चन्द्र घाट पर प्रथम शवदाह गृह स्थापित किया गया।(copy/paste )

Sunday, 21 October 2018

"तुलसी दोहा शतक'' में गोस्वामी तुलसीदास ने किया था राम मंदिर को तोड़े जाने का जिक्र :: #AdvAnshuman

एक तर्क हमेशा दिया जाता है कि अगर बाबर ने राम मंदिर तोड़ा होता तो यह कैसे सम्भव होता कि महान रामभक्त और राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास इसका वर्णन पाने इस ग्रन्थ में नहीं करते ?

ये बात सही है कि रामचरित मानस में गोस्वामी जी ने मंदिर विध्वंस और बाबरी मस्जिद का कोई वर्णन नहीं किया है। हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने इसको खूब प्रचारित किया और जन मानस में यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि कोई मंदिर टूटा ही नहीं था और यह सब झूठ है।

यह प्रश्न इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष भी था। इलाहाबाद उच्च नयायालय में जब बहस शुरू हुयी तो श्री रामभद्राचार्य जी को Indian Evidence Act के अंतर्गत एक expert witness के तौर पर बुलाया गया और इस सवाल का उत्तर पूछा गया।  उन्होंने कहा कि यह सही है कि श्री रामचरित मानस में इस घटना का वर्णन नहीं है लेकिन तुलसीदास जी ने इसका वर्णन अपनी अन्य कृति 'तुलसी दोहा शतक' में किया है जो कि श्री रामचरित मानस से कम प्रचलित है।

अतः यह कहना गलत है कि तुलसी दास जो कि बाबर के समकालीन भी थे,ने राम मंदिर तोड़े जाने की घटना का वर्णन नहीं किया है और जहाँ तक राम चरित मानस कि बात है उसमे तो कहीं भी मुग़लों की भी चर्चा नहीं है इसका मतलब ये निकाला जाना गलत होगा कि तुलसीदास के समय में मुगल नहीं रहे।

हमारे वामपंथी विचारको तथा इतिहासकारो ने ये भ्रम की स्थति उतपन्न की,कि रामचरितमानस में ऐसी कोई घटना का वर्णन नही है . श्री नित्यानंद मिश्रा ने जिज्ञाशु के एक पत्र व्यवहार में "तुलसी दोहा शतक " का अर्थ इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रस्तुत किया है | हमनें भी उन दोहों के अर्थो को आप तक पहुँचाने का प्रयास किया है | प्रत्येक दोहे का अर्थ उनके नीचे दिया गया है , ध्यान से पढ़ें |

गोस्वामी जी ने 'तुलसी दोहा शतक' में इस बात का साफ उल्लेख किया है कि किस तरह से राम मंदिर को तोड़ा गया

मंत्र उपनिषद ब्रह्माण्हू बहु पुराण इतिहास।
जवन जराए रोष भरी करी तुलसी परिहास।।

सिखा सूत्र से हीन करी, बल ते हिन्दू लोग।
भमरी भगाए देश ते, तुलसी कठिन कुयोग।।

सम्बत सर वसु बाण नभ, ग्रीष्म ऋतू अनुमानि।
तुलसी अवधहि जड़ जवन, अनरथ किये अनमानि।।

रामजनम महीन मंदिरहिं, तोरी मसीत बनाए।
जवहि बहु हिंदुन हते, तुलसी किन्ही हाय।।

दल्यो मीरबाकी अवध मंदिर राम समाज।
तुलसी ह्रदय हति, त्राहि त्राहि रघुराज।।

रामजनम मंदिर जहँ, लसत अवध के बीच।
तुलसी रची मसीत तहँ, मीरबांकी खाल नीच।।

रामायण घरी घंट जहन, श्रुति पुराण उपखान।
तुलसी जवन अजान तहँ, कइयों कुरान अजान।।

अर्थात :

मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ,

बहु पुरान इतिहास ।

जवन जराये रोष भरि,

करि तुलसी परिहास ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

सिखा सूत्र से हीन करि,

बल ते हिन्दू लोग ।

भमरि भगाये देश ते,

तुलसी कठिन कुजोग ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

बाबर बर्बर आइके,

कर लीन्हे करवाल ।

हने पचारि पचारि जन,

जन तुलसी काल कराल ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

सम्बत सर वसु बान नभ,

ग्रीष्म ऋतू अनुमानि ।

तुलसी अवधहिं जड़ जवन,

अनरथ किय अनखानि ॥

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।

राम जनम महि मंदरहिं,

तोरि मसीत बनाय ।

जवहिं बहुत हिन्दू हते,

तुलसी कीन्ही हाय ॥

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

दल्यो मीरबाकी अवध,

 मन्दिर राम समाज ।

तुलसी रोवत ह्रदय हति,

त्राहि त्राहि रघुराज ॥

मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

राम जनम मन्दिर जहाँ,

तसत अवध के बीच ।

तुलसी रची मसीत तहँ,

मीरबकी खल नीच ॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

रामायन घरि घट जहाँ,

श्रुति पुरान उपखान ।

तुलसी जवन अजान तँह,

करत कुरान अज़ान ॥

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया है।

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