भारत में अधिवक्ता समुदाय को न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। Bar Council of India तथा विभिन्न राज्य बार काउंसिलों द्वारा अधिवक्ताओं को केवल मुकदमों की पैरवी करने वाला पेशेवर नहीं, बल्कि न्याय प्रशासन का अधिकारी (Officer of the Court) भी माना जाता है। ऐसे में जब न्यायालय कक्ष (Court Room) अथवा न्यायालय परिसर के बाहर अधिवक्ताओं के बीच मारपीट, अभद्र व्यवहार या हिंसक झड़प की घटनाएँ सामने आती हैं, तो यह न केवल अधिवक्ता पेशे की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं बल्कि आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास भी प्रभावित करती हैं।
1. बढ़ती घटनाएँ: चिंताजनक प्रवृत्ति:- पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ:-
👉अदालत की बहस के दौरान वकीलों में हाथापाई हुई,
👉बार एसोसिएशन चुनावों के दौरान हिंसा हुई,
👉चेंबर विवाद, फीस विवाद या व्यक्तिगत मतभेद के कारण मारपीट हुई,
👉सोशल मीडिया पोस्ट या पेशेवर प्रतिस्पर्धा के कारण अधिवक्ता आपस में भिड़ गए।
👉उदाहरणस्वरूप:
🔹Tis Hazari Courts में अधिवक्ताओं और पुलिस के बीच हिंसक घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा उत्पन्न की।
🔹Saket District Court में भी अधिवक्ताओं के बीच तनाव की घटनाएँ रिपोर्ट हुईं।
🔹कई जिला न्यायालयों—विशेषकर छोटे शहरों—में बार चुनावों के दौरान झड़पें सामने आती रही हैं।
हालाँकि सभी घटनाएँ व्यापक स्तर पर रिपोर्ट नहीं होतीं, परंतु स्थानीय समाचारों और बार संघों के रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि यह समस्या वास्तविक है।
2. कारण:-
(i) पेशेवर प्रतिस्पर्धा
मुवक्किल, केस और आर्थिक हितों को लेकर प्रतिस्पर्धा कई बार व्यक्तिगत शत्रुता में बदल जाती है।
(ii) बार राजनीति
Bar Council of India तथा स्थानीय बार एसोसिएशनों के चुनावों में गुटबाजी हिंसा का कारण बनती है।
(iii) अनुशासनात्मक तंत्र की कमजोरी
कई बार शिकायत होने के बावजूद समयबद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होती।
(iv) तनाव एवं मानसिक दबाव
लंबित मुकदमे, आर्थिक अस्थिरता और पेशेगत तनाव व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
(v) न्यायालयी मर्यादा का क्षरण
वरिष्ठ-जूनियर परंपरा में आई गिरावट और पेशागत नैतिकता की कमी भी कारण है।
3. विधिक स्थिति:-
👉 Advocates Act, 1961 के अंतर्गत राज्य बार काउंसिल किसी अधिवक्ता के विरुद्ध पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) पर कार्रवाई कर सकती है।
👉धारा 35 के अंतर्गत—
🔹चेतावनी
🔹निलंबन
🔹नामांकन समाप्ति तक की कार्रवाई संभव है।
👉भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिता
🔹यदि मारपीट होती है तो निम्न अपराध बन सकते हैं—
🔹साधारण मारपीट
🔹गंभीर चोट
🔹आपराधिक धमकी
👉लोक सेवक के कार्य में बाधा (यदि न्यायिक कार्य बाधित हो)
🔹वर्तमान में Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के प्रावधान लागू होते हैं।
🔹Contempt of Court
यदि कोर्ट कार्यवाही बाधित होती है तो Contempt of Courts Act, 1971 के तहत कार्यवाही संभव है।
4. न्यायपालिका की दृष्टि:-
Supreme Court of India ने कई निर्णयों में कहा है कि वकीलों की हड़ताल, हिंसा और न्यायिक कार्य में बाधा अस्वीकार्य है।
👉विशेष रूप से:
Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वकीलों की हड़ताल और कार्य बाधा न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है।
👉हिंसक व्यवहार इसी सिद्धांत के विरुद्ध माना जा सकता है।
5. प्रभाव:-
👉न्याय व्यवस्था पर
🔹सुनवाई प्रभावित होती है
🔹मामलों में देरी होती है
🔹मुवक्किलों पर
🔹विश्वास कम होता है
🔹आर्थिक नुकसान होता है
👉अधिवक्ता पेशे पर
🔹गरिमा में गिरावट
🔹युवा वकीलों पर नकारात्मक प्रभाव
6. समाधान:-
(i) कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई
बार काउंसिल को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।
(ii) CCTV एवं सुरक्षा
कोर्ट परिसरों में बेहतर निगरानी व्यवस्था हो।
(iii) मध्यस्थता तंत्र
बार संघों में विवाद समाधान समिति बनाई जाए।
(iv) नैतिक प्रशिक्षण
नए अधिवक्ताओं को पेशेवर आचार संहिता का प्रशिक्षण दिया जाए।
(v) वरिष्ठों की भूमिका
वरिष्ठ अधिवक्ताओं को मार्गदर्शन एवं अनुशासन बनाए रखने में सक्रिय होना चाहिए।
👉निष्कर्ष:- अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग होता है। यदि न्यायालय परिसर स्वयं हिंसा का स्थल बन जाए तो यह लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।
अतः आवश्यक है कि Bar Council of India, राज्य बार काउंसिल, न्यायपालिका तथा स्वयं अधिवक्ता समुदाय इस समस्या को गंभीरता से लें और न्यायालय की गरिमा बनाए रखें।
“जहाँ विधि के संरक्षक ही विधि का उल्लंघन करने लगें, वहाँ न्याय की प्रतिष्ठा संकट में पड़ जाती है।”
आलेख द्वारा - अंशुमान दुबे एडवोकेट