Sunday, 10 May 2026

उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए मेडिक्लेम योजना: न्यायपालिका की पहल बनाम सरकारों और बार संस्थाओं की जिम्मेदारी - अंशुमान दुबे (एडवोकेट/रिपोर्टर)

उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए व्यापक मेडिक्लेम/हेल्थ इंश्योरेंस योजना का मुद्दा पिछले दो वर्षों में गंभीर रूप से उभरा है। यह केवल एक कल्याणकारी मांग नहीं रह गई है, बल्कि अब यह न्यायपालिका, बार संस्थाओं और सरकारों की जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है। विशेष रूप से Allahabad High Court ने इस विषय पर सक्रिय हस्तक्षेप करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और निर्देश दिए हैं।

1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?:-
(क) 30 मई 2024 का महत्वपूर्ण आदेश
Allahabad High Court में दायर एक जनहित याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में पंजीकृत अधिवक्ताओं के लिए कोई समुचित स्वास्थ्य सुरक्षा योजना नहीं है।
याचिका में कहा गया कि—
•अधिवक्ता न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग हैं।
•अनेक अधिवक्ता गंभीर बीमारी, दुर्घटना, हार्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज जैसी स्थितियों में आर्थिक रूप से टूट जाते हैं।
•अन्य राज्यों जैसे Delhi, Madhya Pradesh, Karnataka और Andhra Pradesh में अधिवक्ताओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं उपलब्ध हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसी कोई व्यापक व्यवस्था नहीं है।
इस पर हाईकोर्ट की खंडपीठ (जस्टिस राजन रॉय एवं जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला) ने उत्तर प्रदेश सरकार से चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने को कहा और पूछा कि अधिवक्ताओं के लिए बीमा योजना क्यों नहीं बनाई जा सकती। 

2. अगस्त 2024 में हाईकोर्ट का और कड़ा रुख:-
बाद की सुनवाई में न्यायालय ने सीधे Bar Council of Uttar Pradesh से पूछा कि, जब अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा उसका वैधानिक दायित्व है, तो वह मेडिक्लेम योजना क्यों नहीं बना रही?
न्यायालय ने बार काउंसिल से हलफनामा मांगा और स्पष्ट किया कि केवल नामांकन शुल्क लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अधिवक्ताओं के सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर भी कार्य होना चाहिए। 

3. अप्रैल 2026 : हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर PIL दर्ज की:-
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब दो अधिवक्ताओं की गंभीर चिकित्सा स्थितियाँ न्यायालय के सामने आईं—
•एक अधिवक्ता सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुए
•दूसरे अधिवक्ता ब्रेन हेमरेज से जूझ रहे थे
•दोनों मामलों में इलाज हेतु धनाभाव की समस्या सामने आई।
इस पर Allahabad High Court ने स्वतः संज्ञान लेते हुए "In Re: Suo Motu Insurance Scheme for Lawyers in State of U.P." नाम से PIL दर्ज करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने पक्षकार बनाया—
•Bar Council of Uttar Pradesh
•Awadh Bar Association
•उत्तर प्रदेश के प्रधान सचिव (विधि)
यह दर्शाता है कि अदालत अब इसे व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि संस्थागत विफलता मान रही है। 

4. बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का रुख:-
Bar Council of India ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर सामूहिक बीमा योजना (Group Insurance Plan) पर कार्य करने की बात कही।
जनवरी 2025 में विभिन्न बार एसोसिएशनों से अधिवक्ताओं का डेटा मांगा गया ताकि एक राष्ट्रीय स्तर की योजना तैयार की जा सके।
यह संकेत देता है कि BCI समस्या को स्वीकार कर चुकी है, लेकिन अभी तक कोई पूर्ण राष्ट्रीय मेडिक्लेम योजना लागू नहीं हो सकी है। 

5. बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश का रुख:-
Bar Council of Uttar Pradesh वर्तमान में कुछ सीमित सहायता योजनाएँ चलाती है—
•मृत्यु सहायता
•दुर्घटना सहायता
•वृद्धावस्था सहायता
•सीमित वित्तीय अनुदान
लेकिन यह योजनाएँ मेडिक्लेम का विकल्प नहीं हैं।
गंभीर बीमारियों जैसे—
•कैंसर
•हार्ट सर्जरी
•किडनी ट्रांसप्लांट
•ICU खर्च
के लिए अभी कोई सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा योजना नहीं है। 

6. केंद्र सरकार का रुख:-
Ministry of Law and Justice ने BCI के साथ समन्वय की बात कही है, लेकिन अभी तक कोई अलग केंद्रीय अधिवक्ता स्वास्थ्य बीमा योजना लागू नहीं हुई।
हालांकि केंद्र सरकार कई पेशागत वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चला रही है, लेकिन अधिवक्ताओं के लिए अलग मेडिकल सुरक्षा नीति अभी अधूरी है।

7. उत्तर प्रदेश सरकार का रुख:-
Government of Uttar Pradesh का रुख अब तक अधिकतर “विचाराधीन” दिखाई देता है।
हाईकोर्ट के आदेशों के बाद सरकार ने जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई व्यापक योजना लागू नहीं हुई।
यही कारण है कि न्यायपालिका बार-बार हस्तक्षेप कर रही है।

मूल समस्या क्या है?
भारत में अधिकांश अधिवक्ता—
•स्वरोजगार आधारित हैं।
•नियमित वेतन नहीं पाते।
•निजी स्वास्थ्य बीमा महंगा होता है।
•वृद्ध अधिवक्ताओं की स्थिति और कठिन होती है।
जब बीमारी आती है तो कई अधिवक्ताओं को—
•चंदा
•बार एसोसिएशन सहायता
•व्यक्तिगत उधार
पर निर्भर होना पड़ता है।
यह स्थिति न्याय व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के लिए चिंताजनक है।

आगे क्या होना चाहिए?
एक आदर्श योजना में होना चाहिए—
✅ कैशलेस इलाज
✅ परिवार कवरेज
✅ गंभीर बीमारी कवर
✅ दुर्घटना बीमा
✅ टर्म लाइफ कवर
✅ वरिष्ठ अधिवक्ताओं हेतु विशेष सहायता
✅ प्रीमियम में सरकार + बार काउंसिल + अधिवक्ता का साझा योगदान

☝️निष्कर्ष
Allahabad High Court ने स्पष्ट संकेत दिया है कि अधिवक्ताओं की स्वास्थ्य सुरक्षा अब टाली नहीं जा सकती।
यदि Bar Council of India, Bar Council of Uttar Pradesh, Government of India और Government of Uttar Pradesh समय रहते ठोस नीति नहीं बनाते, तो न्यायपालिका का दबाव और बढ़ सकता है।

👉न्याय देने वाले अधिवक्ताओं को स्वयं चिकित्सा असुरक्षा में छोड़ देना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

Friday, 8 May 2026

वाराणसी जिला न्यायालय परिसर को वर्तमान स्थान से किसी नये स्थान पर स्थानांतरण के संदर्भ में.........

वाराणसी कचहरी परिसर (जिला न्यायालय परिसर 1913 से कार्यरत हैं।) को वर्तमान स्थान "जिला एवं सत्र न्यायालय, वाराणसी" से किसी नये स्थान पर स्थानांतरित करने की चर्चा पिछले कुछ वर्षों से समय-समय पर उठती रही है। इस विषय में न्यायपालिका, राज्य सरकार, प्रशासन तथा अधिवक्ताओं के संगठनों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं, समाचार रिपोर्टों तथा सामान्य प्रशासनिक तर्कों के आधार पर इस विषय का संकलित आलेख निम्न है:-

1. स्थानांतरण की पृष्ठभूमि : क्यों उठी यह मांग?:-
वर्तमान जिला न्यायालय वाराणसी शहर के अत्यंत व्यस्त क्षेत्र में स्थित है। वर्षों से निम्न समस्याएँ बताई जाती रही हैं—
• अत्यधिक भीड़ एवं यातायात जाम
•पार्किंग की गंभीर समस्या
•न्यायालय भवनों की सीमित क्षमता
•पुराने भवनों की संरचनात्मक चुनौतियाँ
•न्यायिक अधिकारियों, वादकारियों और अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त सुविधाओं का अभाव
•सुरक्षा संबंधी चिंताएँ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा राज्य प्रशासन की ओर से समय-समय पर यह विचार रखा गया कि शहर के बाहरी क्षेत्र में अधिक भूमि लेकर एक आधुनिक न्यायिक परिसर विकसित किया जाए, जहाँ—
•पर्याप्त कोर्ट रूम
•मल्टीलेवल पार्किंग
•रिकॉर्ड रूम
•अधिवक्ता चेंबर
•डिजिटल सुविधाएँ
•बेहतर सुरक्षा व्यवस्था
उपलब्ध हो सके।
ऐसा मॉडल लखनऊ, गौतम बुद्ध नगर आदि कई स्थानों पर नए न्यायालय परिसरों की योजना के संदर्भ में भी देखा गया है।

2. सरकार/प्रशासन की मंशा:- 
राज्य सरकार और जिला प्रशासन की ओर से कथित रूप से यह तर्क दिया गया कि—
•वर्तमान कचहरी क्षेत्र शहर के मुख्य यातायात मार्गों पर दबाव बढ़ाता है।
•न्यायिक अवसंरचना विस्तार के लिए पर्याप्त भूमि नहीं है।
•भविष्य की न्यायिक आवश्यकताओं को देखते हुए बड़ा परिसर जरूरी है।
कभी-कभी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वैकल्पिक भूमि चिन्हांकन की चर्चाएँ भी स्थानीय स्तर पर सामने आईं।
हालाँकि, हर बार यह स्पष्ट नहीं हुआ कि अंतिम स्वीकृत योजना क्या है और नया स्थान कौन सा होगा। कई प्रस्ताव चर्चा स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए।

3. अधिवक्ताओं का विरोध क्यों?:-
वाराणसी बार एसोसिएशन तथा अन्य अधिवक्ता संगठनों ने विभिन्न समयों पर इसका विरोध किया है। उनके प्रमुख तर्क—
(i) ऐतिहासिक महत्व
वर्तमान कचहरी परिसर वाराणसी की न्यायिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
(ii) आम जनता की पहुँच
शहर के केंद्र में होने के कारण वादकारियों के लिए पहुँचना अपेक्षाकृत आसान है।
(iii) अधिवक्ताओं की आजीविका
वर्तमान परिसर के आसपास हजारों लोगों की आजीविका जुड़ी है—
•अधिवक्ता
•टाइपिस्ट
•स्टाम्प विक्रेता
•फोटोकॉपी दुकानें
•दस्तावेज लेखक
•छोटे व्यापारी
(iv) बिना परामर्श निर्णय का आरोप
अधिवक्ताओं का कहना रहा है कि उनसे पर्याप्त संवाद किए बिना निर्णय लेने की कोशिश हुई।
(v) चरणबद्ध विकास का विकल्प
कई अधिवक्ताओं ने कहा कि वर्तमान परिसर को ही आधुनिक बनाया जाए।

4. विरोध के तरीके:-
विभिन्न अवसरों पर अधिवक्ताओं द्वारा—
•धरना
•प्रदर्शन
•न्यायिक कार्य से विरत रहना
•ज्ञापन देना
•बार की आपात बैठक
जैसे कदम उठाए गए हैं।
दी बनारस बार एसोसिएशन जैसे संगठनों ने भी इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई है। वर्तमान में दी बनारस बार एसोसिएशन ने अपनी नयी मांग रखी है, बार के पदाधिकारियों का कहना है कि कचहरी के दक्षिण में बनारस क्लब है, उसको कहीं और स्थानांतरित कर, कचहरी परिसर को बनारस क्लब की भूमि पर विस्तारित किया जाए। वहीं दूसरी ओर दी सेन्ट्रल बार एसोसिएशन 'बनारस' वाराणसी के पदाधिकारियों ने मांग की है कि कचहरी परिसर को सेंट्रल जेल की भूमि पर स्थानांतरित कर दिया जाये। वर्तमान में बनारस बार एसोसिएशन ने दिनांक 07-05-2026 को बनारस क्लब के सामने धरना प्रदर्शन किया और आज दिनांक 08-05-2025 को बार भवन से जूलूस निकालकर अपनी मांग को दोहराया।

5. न्यायिक दृष्टिकोण:-
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का प्राथमिक सरोकार सामान्यतः न्यायिक अवसंरचना सुधार होता है।
यदि किसी नए परिसर से बेहतर कार्यक्षमता संभव हो, तो न्यायपालिका उसका समर्थन कर सकती है। लेकिन व्यवहारिक क्रियान्वयन राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर निर्भर करता है।

6. वर्तमान स्थिति:-
उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह विषय समय-समय पर पुनः उभरता है, लेकिन अधिवक्ताओं के तीव्र विरोध के कारण अभी तक कोई स्थायी एवं अंतिम स्थानांतरण व्यापक रूप से लागू नहीं हुआ है।
यदि भविष्य में कोई औपचारिक अधिसूचना, भूमि अधिग्रहण या निर्माण योजना आती है, तब स्थिति अधिक स्पष्ट होगी।

👉 निष्कर्ष  ::  संपादक/रिपोर्ट के व्यक्तिगत विचार कुछ इस प्रकार से हैं:-
वाराणसी कचहरी स्थानांतरण विवाद केवल भवन परिवर्तन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह
•न्यायिक अवसंरचना
•अधिवक्ताओं के हित
•आम जनता की सुविधा
•ऐतिहासिक पहचान
•शहरी विकास
☝️इन सभी प्रश्नों से जुड़ा विषय है।
एक संतुलित समाधान यही हो सकता है, कि उत्तर प्रदेश सरकार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा वाराणसी बार एसोसिएशन आपसी संवाद से ऐसा मॉडल तैयार करें जिसमें न्यायिक सुविधाएँ भी बढ़ें और अधिवक्ताओं के हित भी सुरक्षित रहें (जैसे:- टिन शेड मुक्त परिसर हो, बार भवन हो, अधिवक्ता चेंबर्स/हाॅल हो, मीटिंग के लिए हाॅल हो, लाईब्रेरी हो, कैंटीन हो, अधिवक्ता पार्किंग अलग हो, आदि) तथा ईमानदारी के साथ सामान्य अधिवक्ताओं हर विषय, प्रत्येक मीटिंग की सूचना बार संघों की संयुक्त साधारण सभा में अथवा समाचार पत्रों, सोशल मीडिया, आदि के माध्यम से पारदर्शिता के साथ सूचित किया जाए। संवाद से ही समाधान संभव है, अहम् के द्वंद में किसी का लाभ नहीं है।
- आलेख द्वारा अंशुमान दुबे एडवोकेट/पत्रकार 

Sunday, 3 May 2026

भारत में कोर्ट रूम एवं कोर्ट परिसर के बाहर अधिवक्ताओं के मध्य मारपीट की घटनाएँ: कारण, विधिक स्थिति एवं समाधान

भारत में अधिवक्ता समुदाय को न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। Bar Council of India तथा विभिन्न राज्य बार काउंसिलों द्वारा अधिवक्ताओं को केवल मुकदमों की पैरवी करने वाला पेशेवर नहीं, बल्कि न्याय प्रशासन का अधिकारी (Officer of the Court) भी माना जाता है। ऐसे में जब न्यायालय कक्ष (Court Room) अथवा न्यायालय परिसर के बाहर अधिवक्ताओं के बीच मारपीट, अभद्र व्यवहार या हिंसक झड़प की घटनाएँ सामने आती हैं, तो यह न केवल अधिवक्ता पेशे की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं बल्कि आम जनता का न्यायपालिका पर विश्वास भी प्रभावित करती हैं।

1. बढ़ती घटनाएँ: चिंताजनक प्रवृत्ति:- पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ:-
👉अदालत की बहस के दौरान वकीलों में हाथापाई हुई,
👉बार एसोसिएशन चुनावों के दौरान हिंसा हुई,
👉चेंबर विवाद, फीस विवाद या व्यक्तिगत मतभेद के कारण मारपीट हुई,
👉सोशल मीडिया पोस्ट या पेशेवर प्रतिस्पर्धा के कारण अधिवक्ता आपस में भिड़ गए।
👉उदाहरणस्वरूप: 
🔹Tis Hazari Courts में अधिवक्ताओं और पुलिस के बीच हिंसक घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा उत्पन्न की।
🔹Saket District Court में भी अधिवक्ताओं के बीच तनाव की घटनाएँ रिपोर्ट हुईं।
🔹कई जिला न्यायालयों—विशेषकर छोटे शहरों—में बार चुनावों के दौरान झड़पें सामने आती रही हैं।
हालाँकि सभी घटनाएँ व्यापक स्तर पर रिपोर्ट नहीं होतीं, परंतु स्थानीय समाचारों और बार संघों के रिकॉर्ड यह संकेत देते हैं कि यह समस्या वास्तविक है।

2. कारण:-
(i) पेशेवर प्रतिस्पर्धा
मुवक्किल, केस और आर्थिक हितों को लेकर प्रतिस्पर्धा कई बार व्यक्तिगत शत्रुता में बदल जाती है।
(ii) बार राजनीति
Bar Council of India तथा स्थानीय बार एसोसिएशनों के चुनावों में गुटबाजी हिंसा का कारण बनती है।
(iii) अनुशासनात्मक तंत्र की कमजोरी
कई बार शिकायत होने के बावजूद समयबद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं होती।
(iv) तनाव एवं मानसिक दबाव
लंबित मुकदमे, आर्थिक अस्थिरता और पेशेगत तनाव व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
(v) न्यायालयी मर्यादा का क्षरण
वरिष्ठ-जूनियर परंपरा में आई गिरावट और पेशागत नैतिकता की कमी भी कारण है।

3. विधिक स्थिति:-
👉 Advocates Act, 1961 के अंतर्गत राज्य बार काउंसिल किसी अधिवक्ता के विरुद्ध पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) पर कार्रवाई कर सकती है।
👉धारा 35 के अंतर्गत—
🔹चेतावनी
🔹निलंबन
🔹नामांकन समाप्ति तक की कार्रवाई संभव है।
👉भारतीय दंड संहिता / भारतीय न्याय संहिता
🔹यदि मारपीट होती है तो निम्न अपराध बन सकते हैं—
🔹साधारण मारपीट
🔹गंभीर चोट
🔹आपराधिक धमकी
👉लोक सेवक के कार्य में बाधा (यदि न्यायिक कार्य बाधित हो)
🔹वर्तमान में Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के प्रावधान लागू होते हैं।
🔹Contempt of Court
यदि कोर्ट कार्यवाही बाधित होती है तो Contempt of Courts Act, 1971 के तहत कार्यवाही संभव है।

4. न्यायपालिका की दृष्टि:-
Supreme Court of India ने कई निर्णयों में कहा है कि वकीलों की हड़ताल, हिंसा और न्यायिक कार्य में बाधा अस्वीकार्य है।
👉विशेष रूप से:
Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वकीलों की हड़ताल और कार्य बाधा न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है।
👉हिंसक व्यवहार इसी सिद्धांत के विरुद्ध माना जा सकता है।

5. प्रभाव:-
👉न्याय व्यवस्था पर
🔹सुनवाई प्रभावित होती है
🔹मामलों में देरी होती है
🔹मुवक्किलों पर
🔹विश्वास कम होता है
🔹आर्थिक नुकसान होता है
👉अधिवक्ता पेशे पर
🔹गरिमा में गिरावट
🔹युवा वकीलों पर नकारात्मक प्रभाव

6. समाधान:-
(i) कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई
बार काउंसिल को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए।
(ii) CCTV एवं सुरक्षा
कोर्ट परिसरों में बेहतर निगरानी व्यवस्था हो।
(iii) मध्यस्थता तंत्र
बार संघों में विवाद समाधान समिति बनाई जाए।
(iv) नैतिक प्रशिक्षण
नए अधिवक्ताओं को पेशेवर आचार संहिता का प्रशिक्षण दिया जाए।
(v) वरिष्ठों की भूमिका
वरिष्ठ अधिवक्ताओं को मार्गदर्शन एवं अनुशासन बनाए रखने में सक्रिय होना चाहिए।

👉निष्कर्ष:- अधिवक्ता केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधि नहीं होता, बल्कि न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग होता है। यदि न्यायालय परिसर स्वयं हिंसा का स्थल बन जाए तो यह लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

अतः आवश्यक है कि Bar Council of India, राज्य बार काउंसिल, न्यायपालिका तथा स्वयं अधिवक्ता समुदाय इस समस्या को गंभीरता से लें और न्यायालय की गरिमा बनाए रखें।

“जहाँ विधि के संरक्षक ही विधि का उल्लंघन करने लगें, वहाँ न्याय की प्रतिष्ठा संकट में पड़ जाती है।”

आलेख द्वारा - अंशुमान दुबे एडवोकेट 

उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए मेडिक्लेम योजना: न्यायपालिका की पहल बनाम सरकारों और बार संस्थाओं की जिम्मेदारी - अंशुमान दुबे (एडवोकेट/रिपोर्टर)

उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए व्यापक मेडिक्लेम/हेल्थ इंश्योरेंस योजना का मुद्दा पिछले दो वर्षों में गंभीर रूप से उभरा है। य...