Thursday, 20 March 2025

न्यायिक अधिकारियों के कितने पद खाली हैं, भारत में (as on 20.03.2025) by #Grok

भारत में न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पदों की संख्या समय-समय पर बदलती रहती है, क्योंकि यह नियुक्तियों, सेवानिवृत्ति, और स्वीकृत पदों की संख्या पर निर्भर करती है। हाल के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर, मैं आपको नवीनतम स्थिति के बारे में जानकारी दे सकता हूँ।

**1. उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट):**  
- 21 मार्च 2023 तक सुप्रीम कोर्ट में कोई रिक्त पद नहीं था। स्वीकृत संख्या 34 जजों की है, और सभी पद भरे हुए थे। हालांकि, यह स्थिति बदल सकती है यदि कोई जज सेवानिवृत्त होता है या अन्य कारणों से पद खाली होता है।

**2. उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट):**  
- 1 जनवरी 2025 तक, देश के 25 उच्च न्यायालयों में स्वीकृत पदों की संख्या 1,114 थी, जिनमें से 327 पद रिक्त थे (लगभग 29.4%)। यानी, 787 जज कार्यरत थे।  
- कुछ प्रमुख उच्च न्यायालयों में रिक्तियां इस प्रकार थीं:  
  - इलाहाबाद हाई कोर्ट: 66 रिक्त (सबसे अधिक)  
  - पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट: 30 रिक्त  
  - बॉम्बे हाई कोर्ट: 26 रिक्त  
  - गुजरात हाई कोर्ट: 20 रिक्त (29 नवंबर 2024 तक)  

**3. जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय (निचली अदालतें):**  
- 3 अगस्त 2023 तक, जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में स्वीकृत पदों की संख्या 25,246 थी, जिनमें से 5,388 पद रिक्त थे। उस समय 19,858 जज कार्यरत थे।  
- नवंबर 2024 तक गुजरात जैसे राज्यों में 535 पद रिक्त थे, जो यह दर्शाता है कि रिक्तियों की समस्या राज्य स्तर पर भी गंभीर है।  
- कुछ अनुमानों के अनुसार, 2025 तक यह संख्या थोड़ी कम हो सकती है यदि भर्ती प्रक्रिया तेज हुई, लेकिन अभी भी 5,000 से अधिक पद रिक्त होने की संभावना है।

**कुल अनुमान (मार्च 2025 तक):**  
- सुप्रीम कोर्ट: 0 से 1 रिक्त (संभावित सेवानिवृत्ति के आधार पर)  
- उच्च न्यायालय: लगभग 300-350 रिक्त  
- निचली अदालतें: लगभग 5,000-5,500 रिक्त  
- **कुल मिलाकर**: भारत में सभी स्तरों पर न्यायिक अधिकारियों के 5,300 से 6,000 पद रिक्त हो सकते हैं। यह संख्या सटीक नहीं है, क्योंकि यह दैनिक आधार पर बदलती है और नवीनतम भर्ती डेटा सार्वजनिक रूप से अद्यतन नहीं हो सकता।

**ध्यान दें:**  
- रिक्तियों को भरने की जिम्मेदारी निचली अदालतों के लिए राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों की है, जबकि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के लिए यह प्रक्रिया कॉलेजियम और केंद्र सरकार के बीच समन्वय से होती है।  
- यदि आपको किसी विशिष्ट राज्य या कोर्ट के लिए सटीक आंकड़े चाहिए, तो मैं उस आधार पर और जानकारी दे सकता हूँ। क्या आप कोई विशिष्ट क्षेत्र जानना चाहते हैं?

एडवोकेट्स संशोधन बिल 2025 के प्रस्ताव में एडवोकेट का नुक़सान - #Grok

एडवोकेट्स (संशोधन) बिल 2025, जो भारत सरकार द्वारा अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में संशोधन के लिए प्रस्तावित किया गया था, को लेकर अधिवक्ता समुदाय में व्यापक विरोध देखा गया। इस बिल को 13 फरवरी 2025 को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया गया था, लेकिन वकीलों के विरोध और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की आपत्तियों के बाद 22 फरवरी 2025 को इसे वापस ले लिया गया। फिर भी, इसके प्रस्तावित प्रावधानों ने अधिवक्ताओं के लिए कई संभावित नुकसानों को उजागर किया था, जिन्हें निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

1. **हड़ताल और विरोध पर प्रतिबंध**:  
   बिल में प्रस्तावित धारा 35A के तहत अधिवक्ताओं और बार एसोसिएशनों को कोर्ट कार्य से बहिष्कार या हड़ताल करने से रोकने का प्रावधान था। इसे व्यावसायिक कदाचार माना जाता और इसके उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती थी। अधिवक्ताओं का मानना था कि यह उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a)) और संगठन बनाने के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(b)) का हनन है। यह उनके लिए कार्यस्थल की समस्याओं या न्यायिक मुद्दों पर आवाज उठाने की क्षमता को सीमित करता।

2. **सरकारी हस्तक्षेप और स्वायत्तता पर खतरा**:  
   प्रस्तावित धारा 4(1)(d) के अनुसार, केंद्र सरकार बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) में तीन सदस्यों को नामित कर सकती थी, और धारा 49B सरकार को बीसीआई को निर्देश जारी करने की शक्ति देती थी। अधिवक्ताओं का तर्क था कि इससे बीसीआई की स्वायत्तता खतरे में पड़ती, जो परंपरागत रूप से एक स्व-नियामक लोकतांत्रिक निकाय रही है। यह सरकार को कानूनी पेशे पर नियंत्रण बढ़ाने का अवसर देता, जो司法 स्वतंत्रता के सिद्धांत के खिलाफ है।

3. **विदेशी कानून फर्मों का प्रवेश**:  
   बिल में विदेशी कानून फर्मों और वकीलों को भारत में काम करने की अनुमति देने का प्रस्ताव था। अधिवक्ताओं को डर था कि इससे स्थानीय वकीलों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, खासकर क्योंकि विदेशी फर्मों के पास अधिक संसाधन और वैश्विक नेटवर्क हैं। इससे भारतीय अधिवक्ताओं का बाजार हिस्सा कम हो सकता था, विशेष रूप से छोटे और मध्यम स्तर के वकीलों के लिए।

4. **कठोर अनुशासनात्मक उपाय**:  
   धारा 24B के तहत, तीन साल या उससे अधिक की सजा वाले अपराध में दोषी अधिवक्ताओं को स्टेट बार काउंसिल के रोल से हटाया जा सकता था। हालांकि यह उचित लग सकता है, लेकिन प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और अपील के अवसरों की कमी के कारण इसे मनमाना माना गया। अधिवक्ताओं को लगता था कि यह उनके संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन कर सकता है।

5. **नुकसान के लिए दायित्व**:  
   धारा 45B में यह प्रस्ताव था कि यदि किसी अधिवक्ता की लापरवाही या कदाचार से किसी को नुकसान होता है, तो शिकायत के आधार पर उनकी जिम्मेदारी तय की जा सकती है। वकीलों का कहना था कि यह अस्पष्ट प्रावधान उनके खिलाफ दुरुपयोग हो सकता है, जिससे उनकी पेशेवर स्वतंत्रता और आत्मविश्वास पर असर पड़ता।

**निष्कर्ष**:  
इन प्रस्तावों से अधिवक्ताओं को अपनी स्वतंत्रता, आजीविका और पेशेवर स्वायत्तता पर खतरा महसूस हुआ। यही कारण है कि देशभर के वकीलों ने इसका विरोध किया और बीसीआई ने इसे "बार की स्वायत्तता और स्वतंत्रता को कमजोर करने वाला" करार दिया। सरकार ने इसे वापस ले लिया है, लेकिन भविष्य में संशोधित बिल पर अधिवक्ताओं की चिंताओं को ध्यान में रखना जरूरी होगा ताकि कानूनी पेशे का संतुलन बना रहे।

Saturday, 15 February 2025

The Advocates (Amendment) Bill :: एडवोकेट्स (संशोधन) विधेयक, 2025 :: प्रावधान और प्रभाव - अंशुमान दुबे

Link of Bill:-
विधेयक का प्रावधान:- 
विधेयक के प्रमुख प्रावधान विधेयक में बार काउंसिल की संरचना में बदलाव, एडवोकेट्स के लिए कड़े अनुशासनात्मक नियम और कानूनी पेशे में पारदर्शिता बढ़ाने जैसे कई संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं। प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:-

1. कानूनी शिक्षा को सशक्त बनाना:-
* भारतीय बार काउंसिल (BCI) द्वारा कानूनी शिक्षा, अनुसंधान और पेशेवर विकास के लिए एक सलाहकार बोर्ड की स्थापना। 
* कानूनी शिक्षा केंद्रों की मान्यता, जिससे विधि संस्थानों को आवश्यक मानकों को पूरा करना अनिवार्य होगा।
* स्नातक और स्नातकोत्तर विधि पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए अनिवार्य प्रवेश परीक्षा।
* एडवोकेट्स की शैक्षिक डिग्रियों की समय-समय पर जांच, जिससे फर्जी नामांकन को रोका जा सके।
* विदेशी कानून डिग्रियों को भारतीय अभ्यास के लिए निर्धारित शर्तों के तहत मान्यता।

2. नामांकन और कानूनी अभ्यास में सुधार:-
* बार परीक्षा अनिवार्य: भारतीय बार परीक्षा (AIBE) या BCI द्वारा निर्धारित अन्य परीक्षाएं एडवोकेट के रूप में नामांकन और कानूनी अभ्यास जारी रखने के लिए अनिवार्य होंगी।
* कानूनी पेशेवर की परिभाषा का विस्तार: इसमें कॉर्पोरेट संस्थानों, वैधानिक निकायों और विदेशी कानून कंपनियों में कार्यरत एडवोकेट्स को शामिल किया जाएगा।
* सत्यापन प्रमाणपत्र: राज्य बार काउंसिल्स के माध्यम से एडवोकेट्स के प्रमाणपत्रों और उनके अभ्यास स्थान का समय-समय पर सत्यापन।
* बार एसोसिएशन सदस्यता अनिवार्य: प्रत्येक एडवोकेट को उस बार एसोसिएशन में पंजीकृत होना अनिवार्य होगा, जहाँ वे अभ्यास करते हैं।

3. बार काउंसिल्स में संरचनात्मक सुधार:-
* बार काउंसिल चुनावों में मतदान और प्रत्याशी बनने के लिए योग्यताओं और अयोग्यता के मानदंड निर्धारित करना।
* तीन वर्ष या उससे अधिक की सजा पाने वाले एडवोकेट्स पर बार काउंसिल सदस्यता से प्रतिबंध।
* केंद्र सरकार द्वारा भारतीय बार काउंसिल (BCI) में तीन सदस्यों का नामांकन।
* BCI में वरिष्ठ महिला एडवोकेट्स में से दो महिला सदस्यों की अनिवार्य नियुक्ति।
* नवगठित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए बार काउंसिल्स का पुनर्गठन।

4. अनुशासनात्मक सुधार और नैतिक मानक:-
* व्यावसायिक कदाचार के लिए कड़ी सजा, जिसमें ₹3 लाख तक का जुर्माना और अभ्यास निलंबन शामिल है।
* एडवोकेट्स द्वारा हड़ताल और बहिष्कार पर सख्त नियम, उल्लंघन करने वालों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई।
* सार्वजनिक शिकायत निवारण समिति: बार काउंसिल के भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायतों के समाधान हेतु एक विशेष समिति का गठन।
* धोखाधड़ी रोकथाम: बिना वैध नामांकन के कानून का अभ्यास करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई।
* कानूनी फर्मों और विदेशी वकीलों के नियमन, जिसमें विदेशी कानूनी कंपनियों के भारत में प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए नियम शामिल हैं।

5. न्याय तक पहुंच में सुधार:-
* अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएँ, दिव्यांग व्यक्ति और आपदा पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता और सहयोग।
* आर्थिक रूप से कमजोर एडवोकेट्स के लिए कल्याणकारी निधि और वित्तीय सहायता प्रावधान।
* एडवोकेट्स के लिए सतत कानूनी शिक्षा अनिवार्य, जिससे वे कानूनी प्रगति से अद्यतन रह सकें।

6. अनुशासनात्मक प्रक्रिया को त्वरित और पारदर्शी बनाना:-
* सभी अनुशासनात्मक कार्यवाही को दो वर्षों के भीतर पूरा करना अनिवार्य।
* यदि राज्य बार काउंसिल कोई कार्रवाई करने में विफल रहती है, तो मामले BCI को हस्तांतरित किए जाएंगे।
* झूठी और निराधार शिकायतों के लिए नए दंड प्रावधान, जिससे एडवोकेट्स को बेबुनियाद आरोपों से बचाया जा सके।

विधेयक का प्रभाव:-

1. पेशेवर मानकों को बढ़ावा:-
* अनिवार्य सत्यापन और पुनः प्रमाणन से उच्च नैतिक और पेशेवर मानक सुनिश्चित होंगे।
* अनुशासनात्मक उपायों को मजबूत करने से कदाचार और अनैतिक व्यवहार पर रोक लगेगी।

2. कानूनी शिक्षा का बेहतर नियमन:-
* मानकीकृत प्रवेश प्रक्रियाएँ और बेहतर शिक्षा गुणवत्ता से विधि डिग्रियों की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
* विदेशी कानून डिग्रियों को मान्यता देने से भारतीय वकीलों को अंतरराष्ट्रीय कानूनी अभ्यास में अधिक अवसर मिलेंगे।

3. पारदर्शिता और जवाबदेही:-
* सार्वजनिक शिकायत निवारण समिति से बार काउंसिल्स के कार्य में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
* बार एसोसिएशन में अनिवार्य पंजीकरण से अभ्यासरत एडवोकेट्स पर निगरानी रखना आसान होगा।

4. फर्जी एडवोकेट्स पर रोक:-
* कड़े नामांकन सत्यापन और अनिवार्य परीक्षाओं से फर्जी वकीलों के न्यायालयों में अभ्यास पर रोक लगेगी।
* बिना प्राधिकरण के कानून का अभ्यास करने वालों पर कड़ी सजा लागू होगी।

5. कानूनी पेशे में अनुशासन:-
* अवैध हड़ताल और बहिष्कार में संलिप्त एडवोकेट्स पर कड़ी कार्रवाई।
* अनुशासनात्मक मामलों का शीघ्र समाधान, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में देरी न हो।

निष्कर्ष:- 
यदि यह विधेयक पारित होता है, तो यह भारत के कानूनी पेशे को आधुनिक बनाएगा, नैतिक मानकों को ऊँचा उठाएगा और कानूनी अभ्यास को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएगा। हालांकि विधेयक में कड़े प्रावधान शामिल हैं, यह एडवोकेट्स के लिए बेहतर सुरक्षा और कल्याण की व्यवस्था भी करता है।

By:- Anshuman Dubey (Advocate)

Sunday, 26 January 2025

गणतंत्र दिवस विशेष - अंशुमान दुबे एडवोकेट

"अधिवक्ता सदैव संविधान के रक्षक रहें हैं। अधिवक्ताओं ने संविधान की गरिमा को अक्षुण्य रखा है। अधिवक्ता समाज के पथ प्रदर्शक और समाज को एक जुट करके दिशा देने वालें होते हैं।"
सादर आभार।
अंशुमान दुबे (एडवोकेट)
प्रत्याशी वरिष्ठ उपाध्यक्ष 2026 
दी बनारस बार एसोसिएशन, वाराणसी 
#advanshumanofficial #अंशुमानदुबे #AdvAnshuman

Thursday, 2 January 2025

अंशुमान दुबे एडवोकेट, प्रत्याशी वरिष्ठ उपाध्यक्ष 2026, दी बनारस बार एसोसिएशन, वाराणसी

कचहरी के भाई बंधुओं (1) ने दी बनारस बार एसोसिएशन वाराणसी के वार्षिक निर्वाचन सत्र 2026 के लिए मेरा नाम "वरिष्ठ उपाध्यक्ष" पद हेतु प्रस्तावित किया है। सभी के प्रस्ताव का सम्मान करते हुए, सत्र 2026 में वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद हेतु मैं अपनी उम्मीदवारी आप सब सम्मानित अधिवक्ता गुरुजनों, बहनों और भाइयों के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूं। अपेक्षा है कि आप सबका स्नेह, आशीर्वाद और अमूल्य मत मुझे अवश्य प्राप्त होगा।
सभी का पुनः सादर आभार व धन्यवाद।
साथ में नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।
आपका अपना 
अंशुमान दुबे एडवोकेट 
पूर्व प्रबंध समिति सदस्य (2010)
पूर्व उपाध्यक्ष (2012) - निर्विरोध 
पूर्व वरिष्ठ प्रबंध समिति सदस्य (2023) - निर्विरोध 
दी बनारस बार एसोसिएशन, वाराणसी
(1) बंधुओं के नाम:-
सादर आभार व धन्यवाद, कृतज्ञता सहित!
Satyendra Kumar Srivastava 
Sanjay Kumar Srivastava 
Mukesh Kumar Vishwakarma 
मुकेश कुमार विश्वकर्मा 
Adv Ashish Sonkar 
 Aashish Shakti Tiwari 
Deepak Mishra 
Adv Jaiky Shukla 
Adv Vineet Shukla 
Vijay Upadhyay 
Sunil Chauhan 
Akhilesh Mishra 
Venkateshwar Kumar Singh
Babar Khan Rijju 
Raman Srivastava 

#AdvAnshuman
 Kashi Sai 
अंशुमान दुबे, अधिवक्ता 
Anshuman Dubey 
Anshuman Dubey #AdvAnshuman 
अंशुमान दुबे लक्ष्मणा 
अंशुमान एसोसिएटस एडवोकेटस 
अंशुमान दुबे फैन्स 
अधिवक्ता अंशुमान दुबे वाराणसी 
केन्द्रीय अधिवक्ता महासभा 
#अंशुमानदुबे 
#AdvAnshuman 
@highlight #follower

Friday, 13 September 2024

न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता के 16 बिंदु:-

न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता के 16 बिंदुओं में से एक यह है कि न्यायाधीश को अपने पद से तब तक कोई वित्तीय लाभ नहीं मांगना चाहिए जब तक कि यह स्पष्ट रूप से उपलब्ध न हो। अन्य बिंदुओं में शामिल हैं:   
न्यायिक स्वतंत्रता: न्यायाधीशों को व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों पहलुओं में न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहिए।   
निष्पक्षता: न्यायाधीशों को अपने निर्णय तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया दोनों में निष्पक्ष होना चाहिए।   
अखंडता: न्यायाधीशों में निष्ठा होनी चाहिए।   
औचित्य: न्यायाधीशों को उचित तरीके से कार्य करना चाहिए और ऐसा करते हुए दिखना भी चाहिए।   
समानता: न्यायाधीशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अदालत में सभी लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाए।   
सार्वजनिक नज़र: न्यायाधीशों को यह पता होना चाहिए कि वे सार्वजनिक जांच के अधीन हैं और उन्हें ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जो उनके उच्च पद के अनुरूप न हो।   
न्यायपालिका को कमजोर करने वाली गतिविधियों से बचना: न्यायाधीशों को ऐसी गतिविधियों से बचना चाहिए जो न्यायपालिका या उनके न्यायिक पद की गरिमा को नुकसान पहुंचा सकती हों।   
व्यावसायिक गोपनीयता: न्यायाधीशों को अपने विचार-विमर्श और गोपनीय जानकारी के संबंध में व्यावसायिक गोपनीयता बनाए रखनी चाहिए।   
व्यक्तिगत प्रतिरक्षा: न्यायाधीशों को अनुचित कार्यों या चूक के लिए मौद्रिक क्षति हेतु सिविल मुकदमों से व्यक्तिगत छूट मिलनी चाहिए।   
One of the 16 points of the code of conduct for judges is that a judge should not seek any financial benefit from their office unless it is clearly available. Other points include: 
 
Judicial independence: Judges should uphold judicial independence in both its individual and institutional aspects. 
 
Impartiality: Judges should be impartial in both the decision they make and the process by which they make it. 
 
Integrity: Judges should have integrity. 
 
Propriety: Judges should act in a proper manner, and appear to do so. 
 
Equality: Judges should ensure that all people are treated equally before the court. 
 
Public gaze: Judges should be aware that they are under public scrutiny and should not act in a way that is unbecoming of their high office. 
 
Avoidance of activities that undermine the judiciary: Judges should avoid activities that may undermine the dignity of the judiciary or their judicial office. 
 
Professional secrecy: Judges should maintain professional secrecy regarding their deliberations and confidential information. 
 
Personal immunity: Judges should have personal immunity from civil suits for monetary damages for improper acts or omissions. 

Thursday, 15 August 2024

स्वतंत्रता के मायने और महिलाओं का सम्मान:-

स्वतंत्रता के मायने तभी हैं जब स्वतंत्रता में मर्यादा, चरित्र और समर्पण का भाव हो। अगर स्वतंत्रता में मर्यादा, चरित्र और समर्पण ही नहीं है तो यह आजादी नहीं बल्कि एक प्रकार का छुट्टापन होता है। जिस पर कोई भी लगाम नहीं होती। यही छुट्टापन देश और समाज में बलात्कार, छेड़खानी, हत्या और मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के अंजाम के लिए जिम्मेदार होता है।
क्या भारत में हर किसी को आजादी से जीने का हक मिल पाया है? हमें आजादी मिली, उसका हमने क्या सदुपयोग किया। लोग पेड़ों को काट रहे हैं। बालिका भ्रूण की हत्या हो रही है। सड़कों पर महिलाओं पर अत्याचार होते हैं। अकेले रह रहे बुजुर्गों की हत्या कर दी जाती है। शराब पीकर लोग देश में सड़क हादसों को अंजाम देते हैं, और दूसरे बेगुनाह लोगों को मार देते हैं। ये कैसी आजादी है, जहां एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के अधिकारों का हनन कर रहा है।
आज भी देश महिलाओं को पूर्णतः स्वतंत्रता नहीं है, आज भी देश में महिलाओं को बाहर अपनी मर्जी से काम करने से रोका जाता है। महिलाओं पर तमाम तरह की बंदिशें परिवार और समाज द्वारा थोपी जाती हैं जो कि संविधान द्वारा प्रदत्त महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों का हनन करती है। आज भी देश में महिलाओं के मौलिक अधिकार चाहे समानता का अधिकार हो, चाहे स्वतंत्रता का अधिकार हो, चाहे धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हो, चाहे शिक्षा और संस्कृति सम्बन्धी अधिकार हो; समाज द्वारा नारियों के हर अधिकार को छीना जाता है या उस पर बंदिशे लगायी जाती हैं, जोकि एक स्वतंत्र देश के नवनिर्माण के लिए शुभ संकेत नहीं है। कोई भी देश तब अच्छे से निर्मित होता है जब उसके नागरिक चाहे महिला हो या पुरुष हो उस देश के कानून और संविधान को पूर्ण रूप से सम्मान करे और उसका कड़ाई से पालन करे।
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भारत के प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान और गणतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहरानी चाहिए और देश के समक्ष आने वाली चुनौतियों का मिलकर सामूहिक रूप से सामना करने का प्रण लेना चाहिए। साथ-साथ देश में शिक्षा, समानता, सद्भाव, पारदर्शिता को बढ़ावा देने का संकल्प लेना चाहिए। जिससे कि देश प्रगति के पथ पर और तेजी से आगे बढ़ सके।

न्यायिक अधिकारियों के कितने पद खाली हैं, भारत में (as on 20.03.2025) by #Grok

भारत में न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पदों की संख्या समय-समय पर बदलती रहती है, क्योंकि यह नियुक्तियों, सेवानिवृत्ति, और स्वीकृत पदों की संख्य...