ज्वाला प्रसाद सिर्फ एक वकील नहीं थे, वे कचहरी की राजनीति के 'स्वघोषित बेताज बादशाह' थे।
राजनीति की पाठशाला और जूनियरों की सेना
ज्वाला जी का सिद्धांत साफ था: "कानून किताबों से नहीं, रसूख से चलता है।" उन्होंने आधा दर्जन जूनियर वकील पाल रखे थे। ये जूनियर कानून की पढ़ाई करने नहीं, बल्कि ज्वाला जी की 'नेतागिरी' को चमकाने के लिए भर्ती किए गए थे।
जूनियरों का 'वर्क प्रोफाइल'
ज्वाला प्रसाद ने अपने जूनियरों को उनकी योग्यता के बजाय उनके 'दम-खम' के आधार पर काम बाँट रखे थे:
* जूनियर नंबर 1 (जिंदाबाद-मुरदाबाद विशेषज्ञ): इसका काम था बार काउंसिल के चुनावों में पोस्टर चिपकाना और जब भी ज्वाला जी अदालत में घुसें, तो पीछे से 'शेर आया-शेर आया' का शोर मचाना।
* जूनियर नंबर 2 (चाय-समोसा मैनेजर): इनका मुख्य काम ज्वाला जी के भारी-भरकम शरीर की ऊर्जा बनाए रखने के लिए समय-समय पर कचहरी की मशहूर कैंटीन से गरमा-गरम नाश्ता लाना था।
* जूनियर नंबर 3 (फर्जी भीड़): जब भी ज्वाला जी को किसी कमजोर केस में जज पर दबाव बनाना होता, यह जूनियर तीस-चालीस 'भाड़े के मुवक्किल' लेकर कोर्ट रूम में खड़ा हो जाता ताकि माहौल गरमाया जा सके।
एक दिन की 'भारी' नेतागिरी
चुनाव करीब थे। ज्वाला प्रसाद को बार एसोसिएशन का अध्यक्ष बनना था। उन्होंने अपने जूनियरों को आदेश दिया, "कल अदालत परिसर में बड़ा विरोध प्रदर्शन होगा। पुलिस की बर्बरता के खिलाफ हम आवाज़ उठाएंगे। सबको काला फीता बांधकर आना है!"
असल में, पुलिस ने ज्वाला जी की एक अवैध पार्किंग वाली गाड़ी उठा ली थी, जिसे उन्होंने 'वकीलों का अपमान' घोषित कर दिया था।
कोर्ट रूम में ड्रामा
अगले दिन, ज्वाला जी अपने जूनियरों की फ़ौज के साथ जज साहब के सामने पेश हुए। उनका गला बैठा हुआ था (ज्यादा समोसे और चुनावी भाषणों के कारण)।
> ज्वाला प्रसाद: "हुज़ूर! यह वकीलों की अस्मिता का सवाल है। मेरे जूनियरों ने कल से अन्न नहीं ग्रहण किया है!"
> (तभी एक जूनियर के थैले से समोसे की खुशबू और चटनी की पुड़िया बाहर गिर गई)
>
जज साहब पुराने खिलाड़ी थे। उन्होंने चश्मा नीचे किया और बोले, "ज्वाला जी, आपका पेट तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। और आपके ये जूनियर वकालत की फाइलें पकड़ने के लिए हैं या आपके चुनाव का झंडा ढोने के लिए?"
अंत: जब 'कुर्सी' और 'कोट' दोनों खिसक गए
ज्वाला जी की नेतागिरी उस दिन धराशायी हो गई जब उनके सबसे पुराने जूनियर ने, जिसे वे सबसे ज्यादा प्रताड़ित करते थे, उनके खिलाफ ही विपक्षी खेमे से पर्चा भर दिया।
उस जूनियर ने कोर्ट में वह डायरी पेश कर दी जिसमें ज्वाला जी द्वारा जजों को 'मैनेज' करने के नाम पर मुवक्किलों से ली गई काली कमाई का हिसाब था।
परिणाम:
* ज्वाला जी चुनाव हार गए।
* उनकी तोंद चिंता के कारण थोड़ी कम होने लगी (क्योंकि अब मुफ्त के समोसे लाने वाले जूनियर भाग चुके थे)।
* बार काउंसिल ने उनके खिलाफ जांच बैठा दी।
> सच्चाई: "जो दूसरों के कंधों पर पैर रखकर ऊँचा उठना चाहते हैं, वे अक्सर तब गिरते हैं जब नीचे वाले कंधे अपनी दिशा बदल लेते हैं।"
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क्या आप चाहते हैं कि मैं उस जूनियर के विद्रोह और ज्वाला प्रसाद के बीच हुई कोर्ट रूम की तीखी बहस का एक सीन लिखूँ?
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