क्या जनता और नेताओं की सोच बदल सकती है?
"लोकतांत्रिक चेतना किसी एक कानून से नहीं आती; वह शिक्षा, आर्थिक सुरक्षा, सूचना की गुणवत्ता, संस्थाओं की मजबूती और लगातार राजनीतिक अनुभव से विकसित होती है।"
वर्तमान परिस्थितियों को परिवर्तित करने के लिए, तीन स्तरों पर प्रयास की आवश्यकता है:-
1. जाति/धर्म से मुद्दों की राजनीति की ओर:-
जब मतदाता यह पूछना शुरू करता है कि मेरे क्षेत्र में रोजगार कितना बढ़ा, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति क्या है, सड़क-पानी-कानून व्यवस्था कैसी है और जनप्रतिनिधि ने क्या काम किया, तब पहचान आधारित राजनीति की शक्ति धीरे-धीरे घटती है।
2. नेता से जवाबदेही की ओर:-
भारतीय लोकतंत्र तब अधिक परिपक्व होगा जब चुनाव में यह पर्याप्त नहीं होगा कि नेता कहे—“मैं आपकी जाति/धर्म/क्षेत्र का प्रतिनिधि हूँ”; बल्कि उससे पूछा जाएगा—“पिछले पाँच वर्ष में आपने किया क्या?”
3. मतदाता से नागरिक बनने की ओर:-
सबसे बड़ा परिवर्तन तब होगा जब हम जाति, धर्म या क्षेत्र के मतदाता से आगे बढ़कर संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों वाले नागरिक के रूप में मतदान करेंगे।
महत्वपूर्ण बात:-
जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र अपने-आप में समस्या नहीं हैं। भारत की विविधता लोकतंत्र की शक्ति भी है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक नेतृत्व इन पहचानों को सामाजिक सम्मान और प्रतिनिधित्व देने के बजाय भय, घृणा और विभाजन पैदा करने के औजार के रूप में इस्तेमाल करता है।
असली सवाल यह नहीं है कि “जातिवाद कब खत्म होगा?” बल्कि यह है:-
“कब भारतीय मतदाता अपनी पहचान के साथ-साथ अपने संवैधानिक और आर्थिक हितों को भी चुनावी निर्णय का प्रमुख आधार बनाएगा?”
भारत में यह परिवर्तन एक पीढ़ी में काफी हद तक दिखाई दे सकता है, यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वतंत्र एवं तथ्यपरक मीडिया, राजनीतिक पारदर्शिता, चुनावी सुधार और नागरिक जागरूकता लगातार मजबूत होते रहें। लेकिन यदि राजनीतिक दलों को विभाजनकारी राजनीति से लगातार चुनावी लाभ मिलता रहा, तो यह प्रक्रिया बहुत लंबी भी हो सकती है।
भारतीय लोकतंत्र की असली परिपक्वता उस दिन मानी जाएगी जब नेता जनता से यह कहना बंद कर दे कि “तुम किस जाति/धर्म के हो?” और जनता नेता से पूछना शुरू कर दे—“तुमने संविधान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय के लिए क्या किया?”
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