अब देश में हिंदी भाषा में कार्य करने में सक्षम न्यायविदों और साहित्य की भी कोई कमी नहीं है। न्यायाधीश बनने के इच्छुक, जिस प्रकार कानून सीखते हैं, ठीक उसी प्रकार हिंदी भाषा भी सीख सकते हैं, चूंकि किसी न्यायाधीश को हिंदी नहीं आती, अत: न्यायालय की भाषा हिंदी नहीं रखी जाए, तर्कसंगत व औचित्यपूर्ण नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायालय न्यायाधीशों और वकीलों की सुविधा के लिए बनाये जाते हैं। देश के विभिन्न न्यायालयों से ही उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश आते हैं। देश के कुल 18008 अधीनस्थ न्यायालयों में से 7165 न्यायालयों की भाषा हिंदी हैं और शेष न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी अथवा स्थानीय भाषा है। इन अधीनस्थ न्यायालयों में भी कई न्यायालयों की कार्य की भाषा अंग्रेजी है, जबकि अभियोजन की प्रस्तुति हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में की जा रही है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, तमिलनाडु आदि इसके उदाहरण हैं। इस प्रकार कई राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों, उच्च न्यायालय में अभियोजन की भाषाएं भिन्न-भिन्न हैं, किंतु उच्च न्यायालय अपनी भाषा में सहज रूप से कार्य कर रहे हैं।
Thursday, 4 September 2014
हिंदी भाषा का उच्चतम न्यायालय में प्रयोग :-
अब देश में हिंदी भाषा में कार्य करने में सक्षम न्यायविदों और साहित्य की भी कोई कमी नहीं है। न्यायाधीश बनने के इच्छुक, जिस प्रकार कानून सीखते हैं, ठीक उसी प्रकार हिंदी भाषा भी सीख सकते हैं, चूंकि किसी न्यायाधीश को हिंदी नहीं आती, अत: न्यायालय की भाषा हिंदी नहीं रखी जाए, तर्कसंगत व औचित्यपूर्ण नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायालय न्यायाधीशों और वकीलों की सुविधा के लिए बनाये जाते हैं। देश के विभिन्न न्यायालयों से ही उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश आते हैं। देश के कुल 18008 अधीनस्थ न्यायालयों में से 7165 न्यायालयों की भाषा हिंदी हैं और शेष न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी अथवा स्थानीय भाषा है। इन अधीनस्थ न्यायालयों में भी कई न्यायालयों की कार्य की भाषा अंग्रेजी है, जबकि अभियोजन की प्रस्तुति हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में की जा रही है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, तमिलनाडु आदि इसके उदाहरण हैं। इस प्रकार कई राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों, उच्च न्यायालय में अभियोजन की भाषाएं भिन्न-भिन्न हैं, किंतु उच्च न्यायालय अपनी भाषा में सहज रूप से कार्य कर रहे हैं।
Sunday, 24 August 2014
साइबर अपराध और साइबर कानून :-
17 अक्टूबर, 2000 को इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 (सूचना तकनीक क़ानून, 2000) अस्तित्व में आया. 27 अक्टूबर, 2009 को एक घोषणा द्वारा इसे संशोधित किया गया. संशोधित क़ानून में परिभाषाएं निम्नवत हैं :
(ए) यहां क़ानून से तात्पर्य सूचना तकनीक क़ानून, 2000 से है.
(बी) संवाद (कम्युनिकेशन) का मतलब किसी भी तरह की जानकारी या संकेत के प्रचार, प्रसार या उसे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना है. यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, किसी भी तरह का हो सकता है.
(सी) संवाद सूत्र (कम्युनिकेशन लिंक) का अर्थ कंप्यूटरों को आपस में एक-दूसरे से जोड़ने के लिए प्रयुक्त होने वाले सैटेलाइट, माइक्रोवेव, रेडियो, ज़मीन के अंदर स्थित कोई माध्यम, तार, बेतार या संचार का कोई अन्य साधन हो सकता है.
सूचना तकनीक क़ानून 9 जनवरी, 2000 को पेश किया गया था. 30 जनवरी, 1997 को संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में प्रस्ताव संख्या 51/162 द्वारा सूचना तकनीक की आदर्श नियमावली (जिसे यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड लॉ के नाम से जाना जाता है) पेश किए जाने के बाद सूचना तकनीक क़ानून, 2000 को पेश करना अनिवार्य हो गया था. संयुक्त राष्ट्र की इस नियमावली में संवाद के आदान-प्रदान के लिए सूचना तकनीक या काग़ज़ के इस्तेमाल को एक समान महत्व दिया गया है और सभी देशों से इसे मानने की अपील की गई है. सूचना तकनीक क़ानून, 2000 की प्रस्तावना में ही हर ऐसे लेनदेन को क़ानूनी मान्यता देने की बात उल्लिखित है, जो इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स के दायरे में आता है और जिसमें सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए सूचना तकनीक का इस्तेमाल हुआ हो. इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स सूचना के आदान-प्रदान और उसके संग्रहण के लिए काग़ज़ आधारित माध्यमों के विकल्प के रूप में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का इस्तेमाल करता है. इससे सरकारी संस्थानों में भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दस्तावेज़ों का आदान-प्रदान संभव हो सकता है और इंडियन पेनल कोड, इंडियन एविडेंस एक्ट 1872, बैंकर्स बुक्स एविडेंस एक्ट 1891 और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 अथवा इससे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े किसी भी क़ानून में संशोधन में भी इन दस्तावेज़ों का उपयोग हो सकता है.
संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली ने 30 जनवरी, 1997 को प्रस्ताव संख्या ए/आरइएस/51/162 के तहत यूनाइटेड नेशंस कमीशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड लॉ द्वारा अनुमोदित मॉडल लॉ ऑन इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स (इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स से संबंधित आदर्श कानून) को अपनी मान्यता दे दी. इस क़ानून में सभी देशों से यह अपेक्षा की जाती है कि सूचना के आदान-प्रदान और उसके संग्रहण के लिए काग़ज़ आधारित माध्यमों के विकल्प के रूप में इस्तेमाल की जा रहीं तकनीकों से संबंधित कोई भी क़ानून बनाने या उसे संशोधित करते समय वे इसके प्रावधानों का ध्यान रखेंगे, ताकि सभी देशों के क़ानूनों में एकरूपता बनी रहे. सूचना तकनीक क़ानून 2000 17 अक्टूबर, 2000 को अस्तित्व में आया. इसमें 13 अध्यायों में विभक्त कुल 94 धाराएं हैं. 27 अक्टूबर, 2009 को इस क़ानून को एक घोषणा द्वारा संशोधित किया गया. इसे 5 फरवरी, 2009 को फिर से संशोधित किया गया, जिसके तहत अध्याय 2 की धारा 3 में इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की जगह डिजिटल हस्ताक्षर को जगह दी गई. इसके लिए धारा 2 में उपखंड (एच) के साथ उपखंड (एचए) को जोड़ा गया, जो सूचना के माध्यम की व्याख्या करता है. इसके अनुसार, सूचना के माध्यम से तात्पर्य मोबाइल फोन, किसी भी तरह का व्यक्तिगत डिजिटल माध्यम या फिर दोनों हो सकते हैं, जिनके माध्यम से किसी भी तरह की लिखित सामग्री, वीडियो, ऑडियो या तस्वीरों को प्रचारित, प्रसारित या एक से दूसरे स्थान तक भेजा जा सकता है.
आधुनिक क़ानून की शब्दावली में साइबर क़ानून का संबंध कंप्यूटर और इंटरनेट से है. विस्तृत संदर्भ में कहा जाए तो यह कंप्यूटर आधारित सभी तकनीकों से संबद्ध है. साइबर आतंकवाद के मामलों में दंड विधान के लिए सूचना तकनीक क़ानून, 2000 में धारा 66-एफ को जगह दी गई है.
66-एफ : साइबर आतंकवाद के लिए दंड का प्रावधान
1. यदि कोई-
(ए) भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा या संप्रभुता को भंग करने या इसके निवासियों को आतंकित करने के लिए-
क. किसी अधिकृत व्यक्ति को कंप्यूटर के इस्तेमाल से रोकता है या रोकने का कारण बनता है.
ख. बिना अधिकार के या अपने अधिकार का अतिक्रमण कर जबरन किसी कंप्यूटर के इस्तेमाल की कोशिश करता है.
ग. कंप्यूटर में वायरस जैसी कोई ऐसी चीज डालता है या डालने की कोशिश करता है, जिससे लोगों की जान को खतरा पैदा होने की आशंका हो या संपत्ति के नुक़सान का ख़तरा हो या जीवन के लिए आवश्यक सेवाओं में जानबूझ कर खलल डालने की कोशिश करता हो या धारा 70 के तहत संवेदनशील जानकारियों पर बुरा असर पड़ने की आशंका हो या-
(बी) अनाधिकार या अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए जानबूझ कर किसी कंप्यूटर से ऐसी सूचनाएं हासिल करने में कामयाब होता है, जो देश की सुरक्षा या अन्य देशों के साथ उसके संबंधों के नज़रिए से संवेदनशील हैं या कोई भी गोपनीय सूचना इस इरादे के साथ हासिल करता है, जिससे भारत की सुरक्षा, एकता, अखंडता एवं संप्रभुता, अन्य देशों के साथ इसके संबंध, सार्वजनिक जीवन या नैतिकता पर बुरा असर पड़ता हो या ऐसा होने की आशंका हो, देश की अदालतों की अवमानना अथवा मानहानि होती हो या ऐसा होने की आशंका हो, किसी अपराध को बढ़ावा मिलता हो या इसकी आशंका हो, किसी विदेशी राष्ट्र अथवा व्यक्तियों के समूह अथवा किसी अन्य को ऐसी सूचना से फायदा पहुंचता हो, तो उसे साइबर आतंकवाद का आरोपी माना जा सकता है.
2. यदि कोई व्यक्ति साइबर आतंकवाद फैलाता है या ऐसा करने की किसी साजिश में शामिल होता है तो उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा सकती है.
2005 में प्रकाशित एडवांस्ड लॉ लेक्सिकॉन के तीसरे संस्करण में साइबरस्पेस शब्द को भी इसी तर्ज पर परिभाषित किया गया है. इसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में फ्लोटिंग शब्द पर खासा जोर दिया गया है, क्योंकि दुनिया के किसी भी हिस्से से इस तक पहुंच बनाई जा सकती है. लेखक ने आगे इसमें साइबर थेफ्ट (साइबर चोरी) शब्द को ऑनलाइन कंप्यूटर सेवाओं के इस्तेमाल के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित किया है. इस शब्दकोष में साइबर क़ानून की इस तरह व्याख्या की है, क़ानून का वह क्षेत्र, जो कंप्यूटर और इंटरनेट से संबंधित है और उसके दायरे में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचनाओं तक निर्बाध पहुंच आदि आते हैं.
सूचना तकनीक क़ानून में कुछ और चीज़ों को परिभाषित किया गया है, जो इस प्रकार हैं, कंप्यूटर से तात्पर्य किसी भी ऐसे इलेक्ट्रॉनिक, मैग्नेटिक, ऑप्टिकल या तेज़ गति से डाटा का आदान-प्रदान करने वाले किसी भी ऐसे यंत्र से है, जो विभिन्न तकनीकों की मदद से गणितीय, तार्किक या संग्रहणीय कार्य करने में सक्षम है. इसमें किसी कंप्यूटर तंत्र से जुड़ा या संबंधित हर प्रोग्राम और सॉफ्टवेयर शामिल है.
सूचना तकनीक क़ानून, 2000 की धारा 1 (2) के अनुसार, उल्लिखित अपवादों को छोड़कर इस क़ानून के प्रावधान पूरे देश में प्रभावी हैं. साथ ही उपरोक्त उल्लिखित प्रावधानों के अंतर्गत देश की सीमा से बाहर किए गए किसी अपराध की हालत में भी उक्त प्रावधान प्रभावी होंगे.
सूचना तकनीक क़ानून, 2000 के अंतर्गत साइबरस्पेस में क्षेत्राधिकार संबंधी प्रावधान
मानव समाज के विकास के नज़रिए से सूचना और संचार तकनीकों की खोज को बीसवीं शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण अविष्कार माना जा सकता है. सामाजिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों, ख़ासकर न्यायिक प्रक्रिया में इसके इस्तेमाल की महत्ता को कम करके नहीं आंका जा सकता, क्योंकि इसकी तेज़ गति, कई छोटी-मोटी द़िक्क़तों से छुटकारा, मानवीय ग़लतियों की कमी, कम ख़र्चीला होना जैसे गुणों के चलते यह न्यायिक प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है. इतना ही नहीं, ऐसे मामलों के निष्पादन में, जहां सभी संबद्ध पक्षों की शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य न हो, यह सर्वश्रेष्ठ विकल्प सिद्ध हो सकता है. सूचना तकनीक क़ानून के अंतर्गत उल्लिखित आरोपों की सूची निम्नवत हैः
1. कंप्यूटर संसाधनों से छेड़छाड़ की कोशिश-धारा 65
2. कंप्यूटर में संग्रहित डाटा के साथ छेड़छाड़ कर उसे हैक करने की कोशिश-धारा 66
3. संवाद सेवाओं के माध्यम से प्रतिबंधित सूचनाएं भेजने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 ए
4. कंप्यूटर या अन्य किसी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट से चोरी की गई सूचनाओं को ग़लत तरीक़े से हासिल करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 बी
5. किसी की पहचान चोरी करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 सी
6. अपनी पहचान छुपाकर कंप्यूटर की मदद से किसी के व्यक्तिगत डाटा तक पहुंच बनाने के लिए दंड का प्रावधान- धारा 66 डी
7. किसी की निजता भंग करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 इ
8. साइबर आतंकवाद के लिए दंड का प्रावधान-धारा 66 एफ
9. आपत्तिजनक सूचनाओं के प्रकाशन से जुड़े प्रावधान-धारा 67
10. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सेक्स या अश्लील सूचनाओं को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 67 ए
11. इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से ऐसी आपत्तिजनक सामग्री का प्रकाशन या प्रसारण, जिसमें बच्चों को अश्लील अवस्था में दिखाया गया हो-धारा 67 बी
12. मध्यस्थों द्वारा सूचनाओं को बाधित करने या रोकने के लिए दंड का प्रावधान-धारा 67 सी
13. सुरक्षित कंप्यूटर तक अनाधिकार पहुंच बनाने से संबंधित प्रावधान-धारा 70
14. डाटा या आंकड़ों को ग़लत तरीक़े से पेश करना-धारा 71
15. आपसी विश्वास और निजता को भंग करने से संबंधित प्रावधान-धारा 72 ए
16. कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का उल्लंघन कर सूचनाओं को सार्वजनिक करने से संबंधित प्रावधान-धारा 72 ए
17. फर्ज़ी डिजिटल हस्ताक्षर का प्रकाशन-धारा 73
सूचना तकनीक क़ानून की धारा 78 में इंस्पेक्टर स्तर के पुलिस अधिकारी को इन मामलों में जांच का अधिकार हासिल है.
इंडियन पेनल कोड (आईपीसी) में साइबर अपराधों से संबंधित प्रावधान
1. ईमेल के माध्यम से धमकी भरे संदेश भेजना-आईपीसी की धारा 503
2. ईमेल के माध्यम से ऐसे संदेश भेजना, जिससे मानहानि होती हो-आईपीसी की धारा 499
3. फर्ज़ी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉड्र्स का इस्तेमाल-आईपीसी की धारा 463
4. फर्ज़ी वेबसाइट्स या साइबर फ्रॉड-आईपीसी की धारा 420
5. चोरी-छुपे किसी के ईमेल पर नज़र रखना-आईपीसी की धारा 463
6. वेब जैकिंग-आईपीसी की धारा 383
7. ईमेल का ग़लत इस्तेमाल-आईपीसी की धारा 500
8. दवाओं को ऑनलाइन बेचना-एनडीपीएस एक्ट
9. हथियारों की ऑनलाइन ख़रीद-बिक्री-आर्म्स एक्ट
Tuesday, 19 August 2014
पुलिस व्यवहार और महिलाएं (मानवाधिकार) कानून :-
Thursday, 14 August 2014
Monday, 28 July 2014
घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005
इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ घरेलू हिंसा शब्द का व्यापक अर्थ लिया गया है। इसमें प्रत्यर्थी का कोई भी ऐसा कार्य, लोप या आचरण घरेलू हिंसा कहलाएगा, यदि वह व्यथित व्यक्ति (पीडि़त) के स्वास्थ्य की सुरक्षा, जीवन, उसके शारीरिक अंगों या उसके कल्याण को नुकसान पहुंचाता है या क्षतिग्रस्त करता है या ऐसा करने का प्रयास करता है। इसमें व्यथित व्यक्ति का शारीरिक दुरुपयोग, शाब्दिक या भावनात्मक दुरुपयोग और आर्थिक दुरुपयोग शामिल है। (धारा 3-क) राज्य सरकार द्वारा घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत सभी उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग एवं समस्त बाल विकास परियोजना अधिकारियों एवं समस्त प्रचेताओं को कुल 574 अधिकारियों को संरक्षण अधिकारी नियुक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त संरक्षण अधिकारी संविदा के आधार पर स्वीकृत किये गये हैं। राज्य में अभी तक 87 गैर-शासकीय संस्थाओं को सेवाप्रदाता के रूप में पंजीकृत किया गया है तथा 13 संस्थाओं को आश्रयगृह के रूप में अधिसूचित किया गया है।
राज्य में सरकार के अधीन संचालित सभी जिला अस्पतालों, सेटेलाइट अस्पतालों, उपजिला अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को चिकित्सा सुविधा के रूप में अधिसूचित किया गया है। मजिस्ट्रेट द्वारा किसी प्रकरण में परामर्शदाता नियुक्त करने हेतु जिलों में परामर्शदाताओं की सूची उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग (जिला संरक्षण अधिकारी) द्वारा तैयार की जाती है। व्यथित महिलाओं को तुरंत राहत पहुंचाने आदि के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रावधान किया गया है। प्रत्येक जिले में आवश्यकतानुसार राशि आवंटित की गई है। घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम की उपयुक्त क्रियान्वति एवं प्रबोधन की दृष्टि से जिला महिला सहायता समिति को शीर्ष संस्था बनाया गया है।
व्यथित महिला किससे सम्पर्क करे-
संरक्षण अधिकारी से सम्पर्क कर सकती है। (सम्बन्धित उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास, बाल विकास परियोजना अधिकारी एवं प्रचेता) सेवा प्रदाता संस्था से सम्पर्क कर सकती है। पुलिस स्टेशन से सम्पर्क कर सकती है। किसी भी सहयोगी के माध्यम से अथवा स्वयं सीधे न्यायालय में प्रार्थना पत्र दे सकती है।
व्यथित महिला को राहत-
इस अधिनियम के अन्तर्गत व्यथित महिला को मजिस्ट्रेट उसके संतान या संतानों को अस्थाई अभिरक्षा, घरेलू हिंसा के कारण हुई किसी क्षति के लिए प्रतिकार आदेश एवं आर्थिक सहायता के लिए आदेश दे सकते हैं। साथ ही आवश्यकता पडऩे पर 'साझा घरÓ में निवास के आदेश भी दिए जा सकते हैं। अधिनियम की धारा 33 के अन्तर्गत न्यायालय द्वारा पारित संरक्षण आदेश की अनुपालना नहीं करने पर प्रत्यर्थी को एक वर्ष तक का दंड एवं बीस हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों का दंड दिया जा सकता है।
Sunday, 13 July 2014
भारतीय पुलिस अधिनियम (Act) 1861
Wednesday, 18 June 2014
Spread the Legal Knowledge :-
Why Basic Legal Education is Necessary?
But, the question is “Which Rights? ", “How to enforce it?", “Am I interested in enforcing those right? ", or “Even after knowing those rights I couldn't enforce it, because I do not know how to enforce it". Indeed, it is true that even after having the knowledge of infringement of Rights, usually a person would ignore it as he doesn't know the means to enforce it. And it encourages such persons, who are infringing the rights of several persons without any reason. Moreover, this is the reason why certain basic knowledge of legal education is necessary. Our Constitution has provided certain Fundamental Rights for every citizen and certain Fundamental Rights for every person (May not be a citizen), but if you are not related to legal field, then are you aware of these fundamental rights? It would not be wrong to say that there are several people, who are not aware of their Fundamental Rights, and due to which they do not even become aware when their Fundamental Rights get violated without any cause.
Take an example of a person who is caught by a police constable in the street without any reason, and has been dragged by him to the Police Station. Generally, a normal person would only plead not to arrest him, because he has not done something which is wrong. This is due to the lack of certain legal knowledge, he is not aware of the fact that “No Police Constable/ officer can arrest him without a warrant (except some serious issues) ". Lack of knowledge is the main reason that certain rights of a person get violated so easily. It has been said that “Knowledge is the Power", and indeed it is not wrong. An educated person would be well aware of his rights which no one can take away from him, but what about those persons who do not have any such knowledge and are exploited easily?
How to know whether Your Right has been Violated:-
There are around 952 Law Universities/ Colleges in India, which have been recognized Bar Council of India. There is a provision in these colleges to have a department of "Legal Aid Society/ Legal Aid Clinic ". This is the place where you can go to. If you are in a state of doubt as to whether your Right has been violated or not, run to this place in the law college near you, and they would provide you the information which you are seeking. There are various law colleges who are not actively participating in these activities, and if you go around and ask them the reason why your rights have been taken away by someone, they would also become active.
Moreover, a poor person who is not able to bear the expenses of the court proceeding and the lawyers can run around to the Legal Aid Officer who is available in every District at the District Court. They why to wait, is it not your responsibility to make a common man aware of his rights and how these rights can be saved. It would be better if you could spread this word, not is a casual way but in a forceful way.
धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना - सही या ग़लत?
धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना लोकतांत्रिक राजनीति की स्वस्थ दिशा नहीं है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है...
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एक तर्क हमेशा दिया जाता है कि अगर बाबर ने राम मंदिर तोड़ा होता तो यह कैसे सम्भव होता कि महान रामभक्त और राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलस...
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