वकालत करते हुए 23 वर्ष बीत गए। इस दौरान बार एसोसिएशन के अनेक अध्यक्ष और महामंत्री देखे, बार काउंसिल के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सदस्य भी देखे। हर चुनाव में नए चेहरे, नए नारे, नई घोषणाएँ और अधिवक्ताओं के हितों के लिए बड़े-बड़े संकल्प देखने को मिले। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो एक सवाल मन में उठता है—आखिर इतने वर्षों में अधिवक्ताओं की दशा बदलने के लिए वास्तव में बदला क्या?
सच कहूँ तो चुनाव पूर्व किए गए वादों और चुनाव के बाद उनकी वास्तविक स्थिति में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है। चुनाव से पहले अधिवक्ताओं का कल्याण सर्वोपरि होता है, उनकी समस्याएँ सबसे बड़ा मुद्दा होती हैं और उनके अधिकारों की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण संकल्प। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही समस्याएँ फिर से फाइलों, प्रस्तावों, आश्वासनों और अगले चुनाव के एजेंडे में सिमट जाती हैं।
समाज में आई गिरावट का असर कचहरी पर भी पड़ा
पिछले 23 वर्षों में समाज में जिस प्रकार नैतिक मूल्यों, सामाजिक सरोकारों और निःस्वार्थ सेवा की भावना में गिरावट दिखाई दी है, उसका प्रभाव कचहरी की व्यवस्था पर भी पड़ा है। कचहरी केवल मुकदमों की पैरवी करने का स्थान नहीं, बल्कि न्याय, अधिकार, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहाँ से समाज को दिशा मिलने की अपेक्षा की जाती है।
लेकिन जब नेतृत्व में सिद्धांतों के स्थान पर स्वार्थ, विचारधारा के स्थान पर अवसरवाद और सेवा के स्थान पर पद प्राप्त करने की लालसा हावी होने लगे, तो उसका प्रभाव पूरी व्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है।
आज चिंता केवल इस बात की नहीं है कि अधिवक्ताओं की समस्याएँ हल नहीं हुईं। चिंता इस बात की भी है कि उन समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक संघर्ष करने की इच्छाशक्ति और एकजुटता भी कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
हड़ताल की शक्ति कमजोर, संघर्ष की धार कुंद
एक समय था, जब अधिवक्ताओं की एकजुटता प्रशासन और शासन को अपनी मांगों पर गंभीरता से विचार करने के लिए विवश कर सकती थी। अधिवक्ताओं का सामूहिक निर्णय एक मजबूत संदेश माना जाता था।
आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। हड़ताल करने की शक्ति केवल संख्या से नहीं, बल्कि एकता, अनुशासन, नेतृत्व की विश्वसनीयता और सामूहिक हितों के प्रति प्रतिबद्धता से आती है। जब इन आधारों में कमजोरी आती है, तो आंदोलन का प्रभाव भी कम होने लगता है।
यह विचारणीय है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ पैदा हुईं, जिनमें अधिवक्ताओं का सामूहिक दबाव पहले जैसा प्रभावी नहीं रह गया? क्या इसका कारण नेतृत्व के प्रति विश्वास में कमी है? क्या अधिवक्ता व्यक्तिगत व्यस्तताओं और आर्थिक विवशताओं के कारण सामूहिक संघर्ष से दूर हो रहे हैं? या फिर आंदोलनों का उपयोग भी कहीं-कहीं नेतृत्व की राजनीतिक और चुनावी जरूरतों के अनुसार होने लगा है?
इन प्रश्नों का उत्तर तलाशना जरूरी है।
COP और AIBE: पेशेवर जवाबदेही के साथ कल्याण भी जरूरी
वकालत के क्षेत्र में COP यानी Certificate of Practice तथा AIBE यानी All India Bar Examination जैसी व्यवस्थाएँ सामने आईं। इनके पीछे पेशेवर योग्यता, नियमन और अधिवक्ता के अभ्यास से संबंधित आवश्यकताओं का तर्क है। इन व्यवस्थाओं के औचित्य पर चर्चा हो सकती है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि अधिवक्ताओं के पेशेवर दायित्वों के साथ उनके अधिकारों और कल्याण के प्रति संस्थागत जिम्मेदारी कितनी प्रभावी रही है?
यदि अधिवक्ताओं से नियमों के पालन, परीक्षा और प्रमाणन की अपेक्षा की जाती है, तो क्या उनके लिए सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, पेंशन और आर्थिक सहायता की व्यवस्था भी उसी गंभीरता से सुनिश्चित नहीं होनी चाहिए?
जिम्मेदारियाँ बढ़ें, यह उचित हो सकता है; लेकिन जिम्मेदारियों के साथ अधिकारों और कल्याण की व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए।
मेडिक्लेम, पेंशन और युवा भत्ता: मांगें आज भी सवाल बनी हुई हैं
अधिवक्ताओं के कल्याण से जुड़ी अनेक मांगें वर्षों से चर्चा में रही हैं। इनमें प्रमुख रूप से—
- अधिवक्ताओं के लिए प्रभावी मेडिक्लेम और स्वास्थ्य सुरक्षा।
- अधिवक्ताओं के लिए सम्मानजनक पेंशन या सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था।
- आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद अधिवक्ताओं के लिए सहायता।
- युवा अधिवक्ताओं के लिए व्यावहारिक आर्थिक सहयोग या युवा भत्ता।
- दिवंगत अधिवक्ताओं के आश्रितों के लिए समयबद्ध और पर्याप्त सहायता।
- अधिवक्ताओं के पेशेवर सम्मान, सुरक्षा और कार्य परिस्थितियों में सुधार।
इन विषयों पर चुनाव के समय भाषण होते हैं, घोषणाएँ होती हैं, संकल्प लिए जाते हैं और अधिवक्ताओं के बीच उम्मीदें जगाई जाती हैं। लेकिन वर्षों बाद भी जब इन मांगों के समाधान की स्थिति पर सवाल उठता है, तो अधिवक्ताओं को ठोस परिणाम, समयसीमा और जवाबदेही के आधार पर नेतृत्व का मूल्यांकन करना पड़ता है।
विडंबना यह है कि जिन मांगों को पूरा करने का वादा करके समर्थन प्राप्त किया जाता है, वही मांगें अगले चुनाव में फिर से उठाई जाती हैं।
क्या अधिवक्ताओं के कल्याण की मांगें केवल चुनाव जीतने का साधन बनकर रह जाएँगी, या कभी उनके समाधान की निश्चित समयसीमा भी तय होगी?
चुनावी संस्कृति: विचारों से ज्यादा प्रबंधन का महत्व?
एक और प्रवृत्ति पर चर्चा जरूरी है। चुनाव के समय सशुल्क जूनियरों, चुनावी प्रबंधन करने वालों और विभिन्न प्रकार के प्रचार तंत्रों की भूमिका बढ़ती दिखाई देती है। इसमें किसी भी व्यक्ति को पारिश्रमिक देकर काम पर रखने को अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता; चुनावी काम में पेशेवर सहयोग स्वाभाविक भी हो सकता है।
समस्या तब पैदा होती है, जब चुनाव का केंद्र उम्मीदवार का काम, चरित्र, दृष्टिकोण और अधिवक्ताओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता न होकर केवल संसाधनों, प्रचार-प्रबंधन और मतों को प्रभावित करने की रणनीतियों तक सिमट जाए।
जब चुनाव सेवा की योग्यता का मूल्यांकन करने के बजाय प्रबंधन की क्षमता का प्रदर्शन बन जाए, तब ईमानदार और मुद्दों पर आधारित नेतृत्व के सामने कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं।
क्या उम्मीदवार का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने पिछले कार्यकाल में क्या किया, कौन-से वादे पूरे किए और अधिवक्ताओं के हित में कौन-से ठोस प्रयास किए?
जातिवादी मठाधीशी: संगठन के भीतर विभाजन की राजनीति
इसके साथ ही जातिगत समीकरणों और प्रभावशाली समूहों की भूमिका भी एक गंभीर प्रश्न है। जब किसी संगठन में योग्यता, ईमानदारी और कार्यक्षमता से अधिक महत्व जातिगत पहचान, गुटबंदी और व्यक्तिगत प्रभाव को मिलने लगे, तो संगठन की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है।
जाति के आधार पर किसी व्यक्ति का समर्थन करना या किसी सामाजिक समूह का प्रतिनिधित्व करना अपने आप में दोष नहीं है। समस्या तब है, जब जाति को योग्यता का विकल्प और व्यक्तिगत हितों को सामूहिक कल्याण से ऊपर रख दिया जाता है।
बार एसोसिएशन और बार काउंसिल जैसी संस्थाओं का उद्देश्य किसी जाति, गुट या व्यक्ति विशेष के हितों की रक्षा तक सीमित नहीं हो सकता। इनका दायित्व समस्त अधिवक्ता समुदाय के अधिकारों, सम्मान और कल्याण के लिए काम करना है।
अधिवक्ता की पहचान उसके ज्ञान, आचरण, ईमानदारी और संघर्ष से होनी चाहिए—न कि इस बात से कि वह किस जाति या गुट से संबंध रखता है।
निःस्वार्थ नेतृत्व का संकट और कार्यकर्ताओं की बदलती भूमिका
23 वर्षों के अनुभव के बाद मन में सबसे बड़ी निराशा यही है कि व्यवस्था को बदलने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन व्यवस्था बदलने के लिए आवश्यक निःस्वार्थ नेतृत्व और निःस्वार्थ प्रशासन दुर्लभ दिखाई देते हैं।
पद सेवा का माध्यम होना चाहिए, प्रतिष्ठा का स्थायी प्रमाणपत्र नहीं। नेतृत्व का अर्थ दूसरों से सम्मान प्राप्त करना भर नहीं, बल्कि कठिन समय में जिम्मेदारी उठाना भी है। प्रशासन का अर्थ केवल नियमों और प्रक्रियाओं का संचालन नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी है।
लेकिन जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा सामूहिक हितों पर हावी हो जाए, तो संगठन धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से दूर होने लगता है।
इस स्थिति का एक दूसरा पहलू भी है—कार्यकर्ताओं की बदलती मानसिकता। कभी लोग विचार, सिद्धांत और संगठन के प्रति निष्ठा के कारण काम करते थे। आज अनेक जगहों पर कार्यकर्ताओं के सामने भी निजी लाभ, पद, पहचान और भविष्य में मिलने वाले प्रतिफल की अपेक्षाएँ महत्वपूर्ण हो गई हैं।
हालाँकि सभी कार्यकर्ताओं को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। आज भी ऐसे लोग हैं जो बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के काम करते हैं। लेकिन निःस्वार्थ कार्यकर्ताओं की भूमिका कमजोर पड़ने लगे, तो संगठन का चरित्र भी बदलने लगता है।
जब नेतृत्व सेवा के बजाय स्वार्थ से प्रेरित हो और कार्यकर्ता विचार के बजाय लाभ से, तब संगठन केवल नाम और ढाँचे में जीवित रहता है; उसकी आत्मा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
क्या व्यवस्था कभी बदलेगी?
अनुभव बार-बार यही कहता है कि चेहरे बदलते रहेंगे, पदाधिकारी आते-जाते रहेंगे, चुनाव होते रहेंगे और नए वादे किए जाते रहेंगे। लेकिन यदि व्यवस्था की कार्यशैली, नेतृत्व की जवाबदेही और अधिवक्ताओं की सामूहिक चेतना में परिवर्तन नहीं आया, तो परिणाम भी बहुत अलग नहीं होंगे।
फिर भी, यह मान लेना कि कुछ नहीं बदल सकता, शायद सबसे बड़ी हार होगी। व्यवस्था अपने आप नहीं बदलती; उसे बदलने के लिए जागरूक सदस्य, पारदर्शी नेतृत्व, सक्रिय निगरानी और वादों का हिसाब माँगने वाली मजबूत संस्थागत संस्कृति चाहिए।
बार एसोसिएशन और बार काउंसिल के चुनाव में केवल यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि उम्मीदवार कौन है, उसका समर्थक कौन है और उसके पास कितना चुनावी प्रबंधन है। यह भी पूछा जाना चाहिए—
1. पिछले कार्यकाल में उसने अधिवक्ताओं के लिए क्या ठोस काम किया?
2. उसने कौन-से वादे किए थे और उनमें से कितने पूरे हुए?
3. अधिवक्ताओं के कल्याण के लिए उसकी कार्ययोजना क्या है?
4. प्रत्येक प्रस्ताव को लागू करने की समयसीमा क्या होगी?
5. यदि वादे पूरे नहीं होते, तो जवाबदेही कैसे तय होगी?
6. क्या वह चुनाव के बाद भी सामान्य अधिवक्ता की समस्याओं के लिए उपलब्ध रहेगा?
जब तक चुनाव में इन सवालों का महत्व नहीं बढ़ेगा, तब तक केवल नारों और घोषणाओं के आधार पर नेतृत्व चुनने की परंपरा बदलना कठिन होगा।
अंत में—23 साल का अनुभव, एक कड़वा सवाल
मुझे न किसी पद से व्यक्तिगत शिकायत है, न किसी व्यक्ति विशेष से। मेरा सवाल उस कार्यसंस्कृति से है, जिसमें अधिवक्ताओं की समस्याएँ चुनावी भाषणों में जीवित रहती हैं, लेकिन उनके समाधान की गति अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं दिखाई देती।
23 वर्षों में अनेक अध्यक्ष, महामंत्री, चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सदस्य आए और गए। हर बार उम्मीद जगी कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। लेकिन जब वही मुद्दे बार-बार सामने आते हैं, तो सवाल व्यक्तियों से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था पर खड़ा हो जाता है।
आखिर कब तक अधिवक्ताओं के कल्याण के नाम पर चुनाव जीते जाते रहेंगे? कब तक मेडिक्लेम, पेंशन और युवा भत्ते जैसी मांगें घोषणापत्रों की शोभा बनकर रह जाएँगी? और कब अधिवक्ता समुदाय अपने प्रतिनिधियों से केवल वादे नहीं, बल्कि उनके परिणामों का हिसाब माँगेगा?
व्यवस्था बदलने की शुरुआत किसी एक महान नेता से नहीं, बल्कि उस दिन से होगी, जब अधिवक्ता व्यक्तिगत संबंधों, जातिगत समीकरणों, गुटबंदी और चुनावी प्रलोभनों से ऊपर उठकर अपने विवेक से निर्णय लेंगे।
क्योंकि सच यही है—
चेहरे बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था तब बदलती है, जब नेतृत्व की नीयत, प्रशासन की कार्यशैली और समाज की सोच बदलती है।
और यदि ऐसा नहीं हुआ, तो आशंका यही है कि अगले 23 वर्षों बाद भी कोई अधिवक्ता इसी कचहरी में खड़ा होकर यही सवाल पूछ रहा होगा—आखिर बदला क्या?
— अंशुमान दुबे
अधिवक्ता | रिपोर्टर | शान-ए-काशी