कुत्ता समाज इंसानी नेताओं से बेहद खफा है। ये इंसानी नेता बात-बात में हमारे बच्चों (पिल्लाें) काे और हम कुत्तों काे अपनी लड़ाई में क्याें घसीटते हैं।
जबकि सदियाें से लेकर आज तक लाेग, हमारी वफादारी की मिसाल देते हैं और देते चले आ रहे हैं।
इंसानी नेताओं से विनम्र निवेदन कि, कृपया हम कुत्तों काे अपने विवादाें में ना घसीटें। हम कुत्ते आज भी अपने मालिकाें के प्रति वफादार हैं और बाबा के आशीर्वाद से सदैव रहेंगे क्याेंकि हम कुत्ते हैं इंसान या नेता नहीं।
कृत-
बाबा कालभैरव की सवारी *श्वान*
Saturday, 24 October 2015
कुत्ता समाज खफ़ा:-
Friday, 23 October 2015
एम सी छागला - पितामह
एम सी छागला : महोम्मेदाली करीम चागला (एम.सी.छागला) (30 सितंबर 1900-9 फ़रवरी 1981) एक प्रसिद्ध भारतीय न्यायधीश, राजनयिक तथा कैबिनेट मंत्री थे, जिन्होनें 1948 से 1958 तक बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की थी।
30 सितंबर 1900 को बंबई में एक धनी शिया मुस्लिम व्यापारी परिवार में जन्मे छागला ने 1905 में अपनी मां की मौत के कारण एकाकी बचपन व्यतीत किया। उन्होनें बंबई के सेंट जेवियर्स हाई स्कूल और कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की, जिसके बाद 1919 से 1922 तक वह अध्ययन करने के लिए लिंकन कॉलेज, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी चले गए। इसके बाद उन्हें बंबई उच्च न्यायालय के बार में दाखिला मिल गया जहां उन्होनें सर जमसेतजी कांगा और मोहम्मद अली जिन्ना, जो बाद में पाकिस्तान के संस्थापक बन गए, जैसे दिग्गजों के साथ काम किया।
छागला ने जिन्ना को अपना आदर्श माना और मुस्लिम लीग के सदस्य बन गए, किन्तु बाद में उनके (जिन्ना) द्वारा पृथक मुस्लिम राज्य की मांग उठाने के बाद उन्होनें जिन्ना से सभी संबंध समाप्त कर लिए. उसके बाद उन्होंने अन्य लोगों के मिल कर बंबई में मुस्लिम नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की जो एक ऐसी पार्टी थी जिसे स्वंत्रता संग्राम के दौरान अनदेखा किया गया और हाशिए में धकेल दिया गया। 1927 में उन्हें बंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में विधि प्रोफ़ेसर के पद पर नियुक्त किया गया, जहां उन्होनें डॉ॰ बी आर अम्बेडकर के साथ काम किया। 1941 में उन्हें बंबई उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया, 1948 में वे मुख्य न्यायधीश बने और 1958 तक इस पद पर सेवा करते रहे.
1946 में, छागला संयुक्त राष्ट्र में भाग लेने वाले पहले भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। 4 अक्टूबर से 10 दिसम्बर 1956 तक छागला तत्कालीन बंबई राज्य के राज्यपाल रहे जो बाद में गुजरात तथा महाराष्ट्र राज्यों में विभक्त हो गया। मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के बाद, वह उस एकल सदस्यीय आयोग का हिस्सा बने जिसने विवादित हरिदास मूंदड़ा एल.आई.सी. बीमा घोटाले के लिए भारत के वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी की जांच की, जिसके कारन टी.टी. कृष्णमाचारी को वित्त मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. कृष्णमाचारी नेहरू के काफी निकट थे और इसलिए नेहरू टीटीके के बारे में छागला द्वारा किए गए खुलासे से काफी नाराज़ थे, हालांकि बाद में उन्होनें छागला को माफ़ कर दिया. सितंबर 1957 से 1959 तक छागला ने हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश के रूप में कार्य किया।
सेवानिवृत्ति के बाद 1958 से 1961 तक उन्होनें संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय राजदूत के रूप में कार्य किया। इसके बाद छागला ने अप्रैल 1962 से सितम्बर 1963 तक ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया। वापिस लौटने के तुरंत बाद, उन्हें कैबिनेट मंत्री का पद ग्रहण करने की पेशकश की गई जो उन्होनें स्वीकार कर ली, तथा 1963 से 1966 तक उन्होनें शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया, इसके बाद नवंबर 1966 से सितम्बर 1967 तक विदेश मामलों के मंत्री के रूप कार्य किया, जिसके बाद उन्होनें सरकारी नौकरी का परित्याग कर दिया. उसके बाद सत्तर वर्ष की उम्र में अपने जीवन के बचे हुए वर्षों में वह सक्रिय रूप से वकालत करते रहे.
जवाहरलाल नेहरू के अधीन शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य करते समय छागला सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को ले कर बहुत परेशान थे:
हमारे संविधान निर्माताओं का इरादा यह नहीं था कि हम सिर्फ झोंपड़ी खड़ी करें, वहां बच्चों को भरें, उन्हें अप्रशिक्षित शिक्षक दें, उन्हें फटी हुई किताबें दें, खेल का कोई मैदान न हो और फिर यह कहें कि हमने अनुच्छेद 45 का पालन किया है और प्राथमिक शिक्षा का विस्तार हो रहा है।.. उनकी इच्छा थी कि 6 से 14 वर्ष की उम्र के बीच हमारे बच्चों को वास्तविक शिक्षा दी जानी चाहिए।
दुर्भाग्य से, यह टिप्पणी आज भी भारतीय शिक्षा के लिए उतनी ही सत्य है।
Vakil/Advocate in India :: भारत में वकील/एडवोकेट
Excellent secular court systems existed under the Mauryas (321-185 BCE) and the Mughals (16th – 19th centuries) with the latter giving way to the current common law system.
During the shift from Mughal legal system, the advocates under that regimen, “Vakil”, too followed suit, though they mostly continued their earlier role as client representatives.
During British rules the indian lawyers i.e. "Vakil" (वकील) are under the Legal Practitioners Act of 1846 which opened up the profession regardless of nationality or religion.
In Republic of India, the law relating to the Advocates is the "Advocates Act, 1961" introduced and thought up by Shri Ashok Kumar Sen, the then law minister of India, which is a law passed by the Parliament and is administered and enforced by the Bar Council of India.
Wednesday, 21 October 2015
अब मेरा दिल कोई मज़हब न मसीहा माँगे :-
अब मेरा दिल कोई मज़हब न मसीहा माँगे
ये तो बस प्यार से जीने का सलीका माँगे
ऐसी फ़सलों को उगाने की ज़रूरत क्या है
जो पनपने के लिए ख़ून का दरिया माँगें
सिर्फ़ ख़ुशियों में ही शामिल है ज़माना सारा
कौन है वो जो मेरे दर्द का हिस्सा माँगे
ज़ुल्म है, ज़हर है, नफ़रत है, जुनूँ है हर सू
ज़िन्दगी मुझसे कोई प्यार का रिश्ता माँगे
ये तआलुक है कि सौदा है या क्या है आख़र
लोग हर जश्न पे मेहमान से पैसा माँगें
कितना लाज़म है मुहब्बत में सलीका ऐ‘अज़ीज़’
ये ग़ज़ल जैसा कोई नर्म-सा लहज़ा माँगे
********* इस सुंदर रचना के लिए जनाब अज़ीज़ आज़ाद जी काे काेटिशः धन्यवाद।
Tuesday, 15 September 2015
सूचना का अधिकार ने आम लोगों को मजबूत और जागरूक बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है:-
सूचना का अधिकार अधिनियम - 2005 (आई.टी.आई.) ने हम लाेगाें और आम लोगों को मजबूत और जागरूक बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह कानून देश में 2005 में लागू हुआ। इस कानून का उपयोग करके आप किसी भी विभाग या सरकारी महकमे से संबंधित अपने काम की जानकारी पा सकते हैं। लेकिन आज हम आपको इसके बारे में कुछ रोचक जानकारी देने जा रहे हैं।
आई.टी.आई. से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछ सकते हैं। किसी भी दस्तावेज की जांच कर सकते हैं। आर.टी.आई. से आप दस्तावेज या डाक्यूमेंट्स की प्रमाणित कॉपी ले सकते हैं। सरकारी कामकाज में इस्तेमाल सामग्री का नमूना भी ले सकते हैं।
कुछ लोगों का सवाल आया है कि, आर.टी.आई. में कौन-कौन सी धारा हमारे काम की हैं?
तो वो इस प्रकार है-
धारा 6 (1)- आर.टी.आई. का ऐप्लीकेशन लिखने की धारा।
धारा 6 (3)- अगर आपका ऐप्लीकेशन गलत विभाग मे चला गया है तो गलत विभाग इसको 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग में 5
दिन के अंदर भेज देगा।
धारा 7(5)- इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नहीं देना होता।
धारा 7 (6)- इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है तो सूचना फ्री में दी जाएगी।
धारा 18- अगर कोई अधिकारी जवाब नहीं देता तो उस की शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाये।
धारा 8- इस के अनुसार वो सूचना आर.टी.आई. में नहीं दी जाएगी, जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा हो या विभाग की आंतरिक जांच को प्रभावित करती हो।
धारा 19 (1)- अगर आपकी आर.टी.आई. का जवाब 30 दिन में नही आता है तो इस धारा के अनुसार आप प्रथम अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हो।
धारा 19 (3)- अगर आपकी प्रथम अपील का भी जवाब नहीं आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर दूसरी अपील अधिकारी को अपील कर सकते हैं।
इसके लिए आप एक सादा पेपर लें और उसमें एक इंच की कोने से जगह छोड़े और नीचे दिए गए प्रारूप में अपने आरटीआई लिख लें-
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सूचना का अधिकार 2005 की धारा 6(1) और 6(3) के अंतर्गत आवेदन :-
सेवा में
(अधिकारी का पद)
जन सूचना अधिकारी---------------
विभाग का नाम-------------------
विषय - आर.टी.आई. एक्ट-2005 के अंतर्गत .................. से संबधित सूचनाएं
1- अपने सवाल यहां लिखें-
2-
3-
4-
मैं आवेदन फीस के रूप में 10 रुका पोस्टल ऑर्डर ........ संख्या अलग से जमा कर रहा / रही हूं या मैं बी.पी.एल. कार्ड धारी हूं इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल. कार्ड नं..............है।
यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/ कार्यालय से सम्बंधित नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए। मेरा आवेदन सम्बंधित लोक सूचना अधिकारी को पांच दिनों के समयाविध् के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत सूचना उपलब्ध् कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।
भवदीय:
नाम:
पता:
फोन नं:
.............................................
ये सब लिखने के बाद अपना हस्ताक्षर करें। अब मित्रो केंद्र से सूचना मांगने के लिए आप 10 रुपया और एक पेपर की कॉपी मांगने के 2 रु देते है और हर राज्य का आरटीआई शुल्क अगल-अलग है। जिसका पता आप कर सकते हैं।
Wednesday, 9 September 2015
प्रदेश सरकार द्वारा मृत अधिवक्ताओं के परिजनों काे 12.09.2015 काे 5 लाख की सहायता राशि दी जायेगी:-
ताे फिर सिर्फ 17 क्याें...??? यह बार काउंसिल के सदस्याें व महाधिवक्ता काे स्पष्ट करना चाहिए।
क्या वाराणसी के किसी मृत अधिवक्ता के परिजन काे भी 5 लाख का चेक मिल रहा है...???
यह प्रश्न इसलिए क्योंकि वाराणसी से तीन सदस्य बार काउंसिल अॉफ उत्तर प्रदेश में हैं और वे मृतक अधिवक्ताओं के प्रति जवाबदेह भी माने जा सकते हैं, यदि वे ऐसा समझते हाे ताे।
Sunday, 30 August 2015
क्या होता है श्रावणी उपाकर्म (रक्षाबंधन) ये क्यों किया जाता है, जानिए :-
रक्षाबंधन (29 अगस्त 2015, शनिवार) के दिन ब्राह्मणों द्वारा श्रावणी उपाकर्म किए जाने का विधान है। यह क्रिया पवित्र नदी के घाट पर सामूहिक रूप से की जाती है। जानिए क्या है श्रावणी उपाकर्म-
श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। सर्वप्रथम होता है- प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है। आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं और पुराने यज्ञोपवित का पूजन भी करते हैं । इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है।
उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घी की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।
धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना - सही या ग़लत?
धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना लोकतांत्रिक राजनीति की स्वस्थ दिशा नहीं है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है...
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वशिष्ठ जी भगवान श्रीराम के वनवास प्रकरण पर भरत जी को समझाते हैं, इस अवसर पर बाबा तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस की एक चौपाई में...
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एक तर्क हमेशा दिया जाता है कि अगर बाबर ने राम मंदिर तोड़ा होता तो यह कैसे सम्भव होता कि महान रामभक्त और राम चरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलस...
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उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के लिए व्यापक मेडिक्लेम/हेल्थ इंश्योरेंस योजना का मुद्दा पिछले दो वर्षों में गंभीर रूप से उभरा है। य...