Friday, 13 January 2023

स्वतंत्र भारत के संत हैं, बाबासाहेब:-


बाबा साहब भीमराव अंबेडकर 19वीं सदी के वे तपस्वी थे जिन्होंने शिक्षा का अलख जगा कर भारत के पिछड़े दलित गरीब असहाय समाज को शिक्षा का महत्व समझाया और बताया की शिक्षा शेरनी के उस दूध की तरह है जिसको पीने वाला दहाड़ता है, दहाड़ता है, दहाड़ता है। 

मैं बाबा साहब को एक संत के रूप में मानता हूं जिसने हम सबको यह सिखाया है कि "संगठित रहो और संघर्ष करो"!

*बाबा साहब द्वारा दो मूल मंत्र हम सब भारत वासियों को दिया गया है....*
पहला यह शिक्षा से प्रेम करो, अच्छी से अच्छी शिक्षा लो, किन्हीं भी परिस्थितियों में रहो शिक्षा से दूर मत भागो, शिक्षा ही हमको संभल देगी, शक्ति देगी और अपने अधिकारों से को प्राप्त करने के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त करेगी।

दूसरा बाबा साहब ने कहा संगठित रह कर हमको संघर्ष करना है अपने लिए अपने समाज के लिए अपने शहर के लिए अपने प्रदेश के लिए अपने देश के लिए।
अगर हम संगठित नहीं रहेंगे तो दुराचारी अत्याचारी और सत्ताधीश लोग हमारा लगातार दोहन करते रहेंगे और हमारे ऊपर अत्याचार करते रहेंगे। इसलिए संगठित रहकर, संघर्ष करना है।

शिक्षा की अलख जगाए रखना है। 
बाबा साहब को शत् शत् नमन है।
बाबा साहब की वजह से आज भारतीय संविधान इतना मजबूत है कि तमाम विरोधी ताकतें उसके संशोधन के संदर्भ में सैकड़ों बार सोच रहे हैं पर कर नहीं 
धन्यवाद बाबा साहब को नमन करता हूं और प्रयास करूंगा कि उनकी कुछ भी उनकी कुछ भी उनकी कुछ भी छोटी सी बात अगर मैं अपने जीवन में आत्मसात कर सकूं तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा इन्हीं शब्दों के साथ अपनी वाणी को विराम दे रहा हूं और आप सब को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं।
इसी प्रकार संगठित रह कर संघर्ष करते रहिए और अपने अधिकारों को प्राप्त करते रहिए।
धन्यवाद आभार
अंशुमान दुबे एडवोकेट
पूर्व उपाध्यक्ष, दी बनारस बार एसोसिएशन वाराणसी
सदस्य प्रत्याशी बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश 

Tuesday, 15 November 2022

कबीर :: शिरडी साईं :: महात्मा गांधी :-

कबीर ने करघे पर बैठकर ऐसी नायाब चादर बुनी, जिसे ऋषि-मुनि सबने ओढ़ी, फिर जस की तस धर दीनी चदरिया। 

साईं बाबा चक्की में रोग-शोक पीसकर सबको मुक्त करते थे, परन्तु बाबा कबीर चलती चाकी देख रोते थे। ‘चलती चाकी देख दिया कबीरा रोय’ अथवा 'चक्की में जाकर कोई साबुत नहीं बचता'। 

साईं बाबा मानते थे, आटे की तरह बिखराे मत, केन्द्र की तरफ जाओ। कबीर के कथन में न गेहूँ बचता है और न घुन। 

साईं बाबा एवं कबीर, दोनों के ही बीच में चक्की जन कल्याण का अद्भुत उपकरण रहा हैं। 

कैसी विचित्र बात है कि, कबीर के चार सौ साल बाद साईं बाबा ने चक्की को जनकल्याण के सन्देश का माध्यम बनाया और साईं बाबा के लगभग पाँच दशक बाद महात्मा गाँधी ने चरखे को परिवर्तन का ज़रिया बनाया। 

जड़ के नीचे तीनाें संताें में एक समानता 'राम' का नाम रहा है। अगर कबीर 'निर्गुण राम' में रमे थे ताे साईं बाबा काे सब 'साईं राम' कह कर भजते हैं तथा गांधी 'हे राम' कह कर उपासना करते थे। यह भी एक जड़ हो सकती है, जिससे ये संत जुड़े थे। 

चक्की व चरखा आध्यात्मिक और सामाजिक परिवर्तन के प्रभावी माध्यम बन गये। प्रतीत हाेता है, तीनों संत अपनी-अपनी तरह वैज्ञानिक थे या फिर कहूं ताे "आध्यात्मिक वैज्ञानिक" थे। तीनों ने परिवर्तन के अपने-अपने यन्त्र ढूँढ़ रखे थे, जाे आज भी प्रभावी हैं और भविष्य में भी प्रभावी रहेंगे।
#भारतमेराधर्म
Web link:-
कबीर :: शिरडी साईं :: महात्मा गांधी :- http://a3advocate.blogspot.com/2015/11/blog-post_14.html

Tuesday, 15 March 2022

नफ़रत कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो ख़ुद ब ख़ुद बढ़ सके। इसे तो जब तक बढ़ाया नहीं जाएगा, यह बढ़ नहीं सकती:-

नफ़रत कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो ख़ुद ब ख़ुद बढ़ सके। इसे तो जब तक बढ़ाया नहीं जाएगा, यह बढ़ नहीं सकती।

इस वक़्त समाज में नफ़रत अगर बढ़ रही है और तेज़ी से बढ़ रही है, तो यह इस बात का खुला सबूत है कि एक गिरोह ऐसा मौजूद है को इसे बढ़ाने कि कोशिश में लगा है और नई नई साजिश कर के नफ़रत को फ़ैला रहा है।

अब समाज के जो लोग नफरतों से नफ़रत करते हैं, उन्हें चाहिए कि नफ़रत फैलाने वाले लोगों को पहचाने और उनको इससे रोकें। उनका हाथ पकड़ें और उन्हें ऐसी हर जगह से दूर रखें जहां से वह अपने गंदे ज़हन का इस्तेमाल करके लोगों के बीच में दुश्मनी पैदा कर सकें।

यह न सिर्फ़ समाज और देश की ज़रूरत है, बल्कि यह इंसानियत को बचाने के लिए भी ज़रूरी है।
अधिवक्ता अंशुमान दुबे वाराणसी 
#AdvAnshuman #अंशुमानदुबे

Sunday, 29 August 2021

चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम संस्कार के बारे में जानने के लिए उनके बनारस के रिश्तेदार श्री शिवविनायक मिश्रा द्वारा दिया गया वर्णन पढ़ना समीचीन होगा:-

चंद्रशेखर आज़ाद के अंतिम संस्कार के बारे में जानने के लिए उनके बनारस के रिश्तेदार श्री शिवविनायक मिश्रा द्वारा दिया गया वर्णन पढ़ना समीचीन होगा। उनके शब्दों में—“आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद होने के बाद इलाहाबाद के गांधी आश्रम के एक सज्जन मेरे पास आये। उन्होंने बताया कि आज़ाद शहीद हो गए हैं और उनके शव को लेने के लिए मुझे इलाहाबाद बुलाया गया है। उसी रात्रि को साढ़े चार बजे की गाडी से मैं  इलाहाबाद  के लिए रवाना हुआ। झूँसी स्टेशन पहुँचते ही एक तार मैंने सिटी मजिस्ट्रेट को दिया कि आज़ाद मेरा सम्बन्धी है, लाश डिस्ट्रॉय न की जाये।   इलाहबाद  पहुँचकर   मैं आनंद भवन पहुँचा तो कमला नेहरू से मालूम हुआ कि शव पोस्टमार्टम के लिए गया हुआ है। मैं सीधा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बँगले पर गया वहाँ उन्होंने बताया कि आप पुलिस सुपरिंटेंडेंट से मिल लीजिये। शायद शव   को जला दिया गया होगा। मुझे पता नहीं कि शव कहाँ है, मैं सुपरिंटेंडेंट से मिला तो उन्होंने मुझसे बहुत वाद-विवाद किया। उसके बाद उन्होंने मुझे भुलावा देकर एक खत दारागंज के दरोगा के नाम से दिया कि त्रिवेणी पर लाश गयी है, पुलिस की देखरेख में इनको अंत्येष्टि क्रिया करने दी जाये। बंगले से बाहर निकला तो थोड़ी ही दूर पर पूज्य मालवीय जी के पौत्र श्री पद्मकांत मालवीय जी दिखाई दिए। उन्हें पता चला था कि मैं आया हुआ हूँ। उनकी मोटर पर बैठकर हम दारागंज पुलिस थानेदार के पास गए। वे हमारे साथ मोटर में त्रिवेणी गए। वहाँ कुछ था ही नहीं। हम फिर से डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बंगले की तरफ जा रहे थे कि एक लड़के ने मोटर रुकवा कर बताया कि शव को रसूलाबाद ले गए हैं।”

“रसूलाबाद पहुंचे तो चिता में आग लग चुकी थी। अंग्रेज सैनिकों ने मिट्टी का तेल चिता पर छिड़क कर आग लगा दी थी और आस पास पड़ी फूस भी डाल दी थी ताकि आग और तेज हो जाये। पुलिस काफी थी। इंचार्ज अफसर को चिट्ठी दिखाई तो उसने मुझे धार्मिक कार्य करने की आज्ञा दे दी। हमने फिर लकड़ी आदि मंगवाकर विधिवत दाह संस्कार किया। चिता जलते जलते श्री पुरुषोत्तमदस टंडन एवं कमला नेहरू भी वहाँ आ गयीं थीं। करीब दो-तीन सौ आदमी जमा हो गए। चिता के बुझने के बाद अस्थि-संचय मैंने किया। इन्हें मैंने त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दिया। कुछ राख एक पोटली में मैंने एकत्रित की तथा थोड़ी सी अस्थियाँ पुलिस वालों की आँखों में धुल झोंक कर मैं लेता आया। उन अस्थियों में से एक आचार्य नरेंद्रदेव भी ले गए थे। शायद विद्यापीठ में जहाँ आज़ाद के स्मारक का पत्थर लिखा है, वहां उन्होंने उस अस्थि के टुकड़े को रखा है। सांयकाल काले कपडे में आज़ाद की भस्मी का चौक पर जुलूस निकला। इलाहाबाद की मुख्य सड़कें अवरूद्ध हो गयी। ऐसा लग रहा था मानो सारा देश अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा है। जलूस के बाद एक सभा हुई। सभा को क्रांतिधर्मा शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने सन्बोधित करते हुए कहा-जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही चंद्रशेखर आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। शाम की गाडी से मैं बनारस चला गया और वहां विधिवत शास्त्रोक्त ढंग से आज़ाद का अंतिम संस्कार किया।”

धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना - सही या ग़लत?

धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना लोकतांत्रिक राजनीति की स्वस्थ दिशा नहीं है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है...