Thursday, 14 May 2015

गुरू काे समर्पित - 3

हमारे एक पिया प्यारा है,
घट घट में उसी का नूर है।
हिन्दू मुस्लिम से भी प्यारा है,
जात पात से भी प्यारा है।
आवे न जावे, मरे ना जीवे,
हमारे एक पिया प्यारा है।

गुरू काे समर्पित - 2

तैरती लाश काे देखकर हमने ये जाना,
वज़न ताे सांसाें में था, जिस्म में नहीं।

गुरू काे समर्पित - 1

परम पिता परमेश्वर व प्रकृति ने मानव में सिर्फ दाे जाति बनायी और वह है "पुरूष" व "स्त्री" और हम मूर्ख मानवाें ने पता नहीं क्या-क्या बना डाला।

Tuesday, 12 May 2015

"मैं ही श्रेष्ठ" क्या यह सही है...???

"मैं ही श्रेष्ठ" की भावना हावी हाेना, अधिवक्ता एकता के लिए घातक है। सरकार, न्यायपालिका, अधिकारी सभी अधिवक्ताआें की एकता ताेड़ने के प्रयास में हैं और कहीं कहीं वे सफलता भी पा रहें हैं। उदाहरण- उत्तर प्रदेश के 34 जिलाें में लागू प्रातःकालीन न्यायालय की व्यवस्था समाप्त हाेना इसका प्रमाण है।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

Sunday, 10 May 2015

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है :- दुष्यंत कुमार

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है

वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है

सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है

उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप
वो आदमी नया है मगर सावधान है

फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है

देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं
पैरों तले ज़मीन है या आसमान है

वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है
~ * ~

Monday, 4 May 2015

कौन किसका मालिक:-

एक राेज़ सूफ़ी संत 'शेख़ फरीद' अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। तभी एक आदमी वहां से एक गाय को ज़बरदस्ती खींचता हुआ निकला।
यह देखकर फरीद ने अपने शिष्यों से पूछा, "तुम्हारे विचार में कौन किससे बंधा है?"
उनकेे शिष्यों ने जवाब दिया कि स्पष्ट है, गाय ही उस आदमी से बंधी है।
फरीद ने फिर पूछा, "अच्छा यह बताओ, कौन किसका मालिक है?"
सब शिष्य इस अजीब से प्रश्न पर हंसने लगे और बोले कि वह आदमी ही मालिक था और कौन? गाय तो पशु है, वह मनुष्य कि स्वामिनी कैसे हो सकती है?"
"अच्छा, यह बताओ कि अग़र रस्सी को तोड़ दिया जाय तो क्या होगा?" फरीद ने पूछा।
शिष्यों ने उत्तर दिया, "तब तो गाय भागने की कोशिश करेगी।"
"और फिर उस आदमी का क्या होगा?" फरीद ने पूछा।
"स्पष्ट रूप से तब तो यह आदमी गाय का पीछा करेगा और गाय के पीछे-पीछे भागेगा।" तुरंत जवाब आया।
जैसे ही शिष्यों ने यह जवाब दिया, वे समझ गए कि कौन किससे बंधा है?

आज यदि हम सोचें कि आज के परपेक्ष्य में हम लोग कार, स्कूटर, बाइक, लैपटॉप, कम्पूटर, डीवीडी, मोबाईल, टीवी इत्यादि भोग विलास की वस्तुओं के मालिक हैं या यह भोग विलास की वस्तुएं हमारी मालिक हैं?
हम इन वस्तुओं का उपयोग अपने लाभ के लिए ही कर रहे हैं या इन वस्तुओं के कारण हमारा नुकसान हो रहा है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि हम इन वस्तुओं के इतने अधिक आदी हो चुके हैं कि हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह ठीक से नहीं कर पा रहे?
हमें यह समझना होगा कि हमें इन भोग विलास के साधनों का उपयोग अपने गुलाम के रूप में करना है और किसी भी कीमत पर इनका गुलाम नहीं बनना है।

कबीर कहिन, सुनत सब पर मानत नाहि:-

साँप के दाँत में विष रहता है, मक्खी के सिर में और बिच्छू की पूँछ में किंतु दुर्जन के पूरे शरीर में विष रहता है। - कबीर
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कष्ट पड़ने पर भी साधु पुरुष मलिन नहीं होते, जैसे सोने को जितना तपाया जाता है वह उतना ही निखरता है। - कबीर
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जिस तरह जौहरी ही असली हीरे की पहचान कर सकता है, उसी तरह गुणी ही गुणवान् की पहचान कर सकता है। – कबीर
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माया मरी न मन मरा, मर मर गये शरीर। आशा तृष्णा ना मरी, कह गये दास कबीर॥ - कबीर
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कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय॥ - कबीर
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यदि सदगुरु मिल जाये तो जानो सब मिल गया, फिर कुछ मिलना शेष नहीं रहा। यदि सदगुरु नहीं मिले तो समझों कोई नहीं मिला, क्योंकि माता-पिता, पुत्र और भाई तो घर-घर में होते हैं। ये सांसारिक नाते सभी को सुलभ है, परन्तु सदगुरु की प्राप्ति दुर्लभ है। - कबीरदास
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केवल ज्ञान की कथनी से क्‍या होता है, आचरण में, स्थिरता नहीं है, जैसे काग़ज़ का महल देखते ही गिर पड़ता है, वैसे आचरण रहित मनुष्‍य शीघ्र पतित होता है। - कबीर
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खेत और बीज उत्‍तम हो तो भी, किसानों के बोने में मुट्ठी के अंतर से बीज कहीं ज्‍यादा कहीं कम पड़ते हैं, इसी प्रकार शिष्‍य उत्‍तम होने पर भी गुरुओं की भिन्‍न-भिन्‍न शैली होने पर भी शिष्‍यों को कम ज्ञान हुआ तो इसमें शिष्‍यों का क्‍या दोष। - संत कबीर
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जब आपका जन्म हुआ तो आप रोए और जग हंसा था. अपने जीवन को इस प्रकार से जीएं कि जब आप की मृत्यु हो तो दुनिया रोए और आप हंसें। - कबीर

धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना - सही या ग़लत?

धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बाँटकर चुनावी लाभ लेना लोकतांत्रिक राजनीति की स्वस्थ दिशा नहीं है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है...