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तुम इक गोरख धन्दा हो!! #AdvAnshuman

Naz Khialvi (1947-2010, real name: Muhammad Siddique) was a Pakistani poet and radio broadcaster from near the city of Faisalabad, most famous for his poem “Tum Ik Gorakh Dhanda Ho”. This philosophically and spiritually rich text explores the paradoxes of religion like the prevalence of evil and injustice, selective divine intervention, and other indecipherable aspects of God. The poem also points toward the unity of human religious experiences. At the end, after listing his grievances, the bewildered poet ultimately accepts divine incomprehensibility.कभी यहाँ तुम्हें ढूँढा, कभी वहाँ पहुँचा
तुम्हारी दीद की ख़ातिर कहाँ-कहाँ पहुँचा
ग़रीब मिट गए, पामाल हो गए लेकिन
किसी तलक न तेरा आज तक निशां पहुँचाहो भी नहीं और, हर जा हो
हो भी नहीं और, हर जा हो
तुम इक गोरख धन्दा हो!हर ज़र्रे में किस शान से तू जल्वा-नुमा है
हैरां है मगर अक़्ल के कैसा है तू, क्या है?
तुम इक गोरख धन्दा हो!तुझे दैर-ओ-हरम में मैंने ढूँढा तू नहीं मिलता
मगर तशरीग-फ़र्मा तुझे अपने दिल में देखा है!
तुम इक गोरख धन्दा हो!ढूँढे नहीं मिले…
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काले चुनाव की जंजीर :: विमल राजस्थानी

जब तक इस काले चुनाव की टूटेगी जंजीर नहीं
तक तक पायल मौन रहेगी, कूकेगी मंजीर नहीं
यह चुनाव की बाढ़ भयंकर
बहे आ रहे पत्थर-कंकर
भोली जनता, मजबूरी में
पूजे-माने जिनको शंकर
ये शिव-शंकर नाग-नाथ हैं
ये बम भोले साँप-नाथ हैं
इनके दायें-बाँये-आगे-पीछे
विषधर नाग साथ हैं
इन्हें झुमातीं, इन्हें लुभातीं, आधुनिकाएँ सुर-बालाएँ
पल भर को भी इन्हें रूलाती दीन-दुखी की पीर नहीं
लोकतंत्र तो कफन ओढ़कर
कब का सोया पड़ा चिता पर
इसे चाहिए और कुछ नहीं
सफल क्रांति की चिनगारी भरजब तक दीन दयालु सुधी जन 
जाते नहीं सुभाष चन्द्र बन
तब तक चक्के जाम रहेंगे
सदा विधाता वाम रहेंगे
सदा विधाता वाम रहेंगे
इस शोषण का अंत न होगा, पतझर छोड़ वसन्त न होगा
जब तक कवि की लौह लेखनी बन जाती शमशीर नहीं
योग्य व्यक्ति झख मारेंगे ही
नेता सब रस गारेंगे ही
त्राहिमाम की मुद्रा में हम
प्रभु को कलप पुकारेंगे ही
दल दलदल-सा लीलेंगे ही
ओझा हमको कीलेंगे ही
जीने को तो उठते-गिरते
जीते हैं हम, जी लेंगे ही
लेकिन जब तक ये चुनाव हैं, छल-छद्मी हैं पेंच दाँव हैं
तब तक कोटि-कोटि इन आँखों का सूखेगा नीर नहीं
यह विधान तो सड़ा-गला है
इससे किसका हुआ भला है ?
गोरे…

India Shining Vs. 2019

दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक के पीता है, इसी प्रकार India Shining से जले 2019 में विकास को फूंक-फूंक कर पीने के मूड में दिख रहे हैं।

आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता??

क्या 1948 में गांधी जी आतंकवादी हमले में मारे गये थे...??? जैसे 1984 में इंदिरा को सिख आतंकवादीयों ने और 1991 में राजीव को तमिल आतंकवादी ने मारा था।
आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता??
#AdvAnshuman

लीडर:-

जो आंसू बहाते थे गीदड़ की तरह,
आज वो ज्ञान बांट रहे हैं लीडर की तरह,
भ्रम में जीने की खुशफहमी तब भी थी,
घमंड में जीने की गलतफहमी आज भी है,
खडे़ थे कल कटोरा लिए सड़क पर तुम,
खडे़ हो आज भी कटोरा लिए सदन में तुम!
#AdvAnshuman

चर्चा विराम का नुस्खा : अधजल गगरी छलकत जाय

लेखक कुलवंत हैप्पी
यह कहावत तब बहुत काम लगती है, जब खुद को ज्ञानी और दूसरे को मूर्ख साबित करना चाहते हों। अगर आप चर्चा करते हुए थक जाएं तो इस कहावत को बोलकर चर्चा समाप्त भी कर सकते हैं मेरी मकान मालकिन की तरह। जी हाँ, मेरी जब जब भी मेरी मकान मालकिन के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो वे अक्सर इस कहावत को बोलकर चर्चा को विराम दे देती है। इसलिए अक्सर मैं भी चर्चा से बचता हूँ, खासकर उसके साथ तो चर्चा करने से, क्योंकि वो चर्चा को बहस बना देती है, और आखिर में उक्त कहावत का इस्तेमाल कर चर्चा को समाप्त करने पर मजबूर कर देती है। मुझे लगता है कि चर्चा और बहस में उतना ही फर्क है, जितना जल और पानी में या फिर आईस और स्नो में।कभी किसी ने सोचा है कि सामने वाला अधजल गगरी है, हम कैसे फैसला कर सकते हैं? क्या पता हम ही अधजल गगरी हों? मुझे तो अधजल गगरी में भी कोई बुराई नजर नहीं आती। कुछ लोगों की फिदरत होती है, हमेशा सिक्के के एक पहलू को देखने की। कभी किसी ने विचार किया है कि अधजल गगरी छलकती है तो सारा दोष उसका नहीं होता, कुछ दोष तो हमारे चलने में भी होगा। मुझे याद है, जब खेतों में पानी वाला घड़ा उठाते…